इल्जाम है हम जिन्दगी मे अब किसी काम के ना रहे,;
क्या जरुरत थी "हुश्न दीदार" से हमें नाकारा बनाने की !
फुर्सत नहीं,जरुरत नहीं, न इमान भी, किसी और को पाने की ;
तुम रहते हो हरवक्त साथ, देख लेते हैं तुम्हे अपनी परछाई मे,
हद हो गई, बहुत हुवा आशियाना, सोचा उन्हें अब भुला देंगे,
पर जब सामने से गुजर गये, सोचा कल होगा दिन आख़री ;
शिकवा था "खुदा" की खुदाई से, दिल में तुम्हारे ख्यालात जगाने का,
वे-बजह की गफलत, खुद "खुदा" को अचरज है तुम्हारी खूबसूरती से…
भेंट क्या करें तुम को फूलों का गुलिस्ता या खिलते गुलाब की कली
तोहींन हमारी,खुद गुलिस्ता या खुद गुलाब है जो,वही उन्हें देने की...
अकेला सा महसूस करता, तन्हाई रातों मे, याद तुम्हे कर लेता हूँ
हर लम्हा खुद-ब-खुद आबाद होता, हुजूम निकलता लाखों चाँद-सितारों का
हाल परवाने सा, शंमा रोशन हुई, खींचे चले आते,पता अन्जाम मिलन का :
हम तो जीते जी मर गये, सांसे चलती आपके साहरे, हैं मजबूर-नाकारा !!
सजन कुमार मुरारका
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