ताउम्र बस मैं रेत के, सेहरा में भटकता रहा।
वो गलत थी राह मैं, जिस राह पर चलता रहा।।
थी लिखी किस्मत मेरी, हाथों की लकीरों में मेरे।
और मैं सर मस्जिद औ, मंदिर में पटकता रहा।।
हर दफा मुझको तो दगा, अपनों से बस मेरे मिली।
आँखों में मैं गैरों से ज्यादा, उनकी खटकता रहा।।
था मैं चाहता बस देखना, चैन-औ-अमन-सद्भावना।
और आदमी जाति-धरम, के नाम पर कटता रहा।।
पत्थर जमाना और दिल था, कांच सा नाज़ुक मेरा।
तफरीह में लोगो की तो मैं, हर बार चटकता रहा।।
किसको यहाँ परवाह थी, हर आदमी खुदगर्ज़ था।
"साहिल" दगाबाजी के विष के, घूँट गटकता रहा।।
*** © *** साहिल मिश्र ***
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