Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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हमारा बचपन

 


8h  · 


हमारा बचपन कितना सुहाना था,
 हर दिन मस्ताना था ,
वो ही खेल पुराने थे ,
वो ही झूले मस्ताने थे, 
व दौड़ वो कब्बड्डी ,
वो हवा ठंडी,
वो गुल्ली डंडा,
 वो पानी की मटकी,
वो दादी की थपकी,
वो  दोस्त वो  कहानी, 
वो  भीगा सा आंगन ,
 वो बारिश का पानी,
सभी की यादें मीठी,
जीवन चुलबुला,
बीत गया जैसे पानी का बुल बुला,
हम किसी भी तरह वो अब ,
वो समय वापस नहीं पा सकते,
कहीं तो वो मकान भी अब नहीं रहे,
वो पड़ोस की चाची बुआ,
क्यों तब सब अपने थे,
क्यों वो  गुलजार सा आंगन,
 आज भी ऐसी कमरों में  बैठे,
 हमारे मन को।पुकारता है,
 बुलाता है क्यों  फिर रुलाता है,
वो 10पैसे में मिलने वाली कुल्फी ,
उस चौक में कहां कब गिरी थी,
 अभी भी याद है,
ठोकर कब  कहां लगी 
वो देहरी वो दीवार
 वो मिट्टी वो पेड़, तितली,
 सब जैसा का तैसा याद है।
बारिशों का आनंद अब भी लेते हैं ,
 बस रामजी की डोकरी नहीं दिखती ,
मिट्टी में पांव डालकर वो घर नहीं बनते।
  बहुत याद आया बचपन ,
मन रोया बार बार हरबार ,
 समझाया पटाया बार बार ,
ओ बचपन तुझे सलाम शत बार |
 लिखा है तो मन भी भर आया बार बार 
प्रभा पारीक ।






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