मैं अपने ही किरदार की नायिका हूँ
— स्वरचित
हर किसी का कुछ न कुछ ख्वाब होता है,
और साहब मन भी बड़ा चंचल और लाजवाब होता है।
मेरा भी एक सपना था,
मेरा मन भी बड़ा चंचल था।
जब कभी फिल्म देखती तो लगता,
काश! मैं नायिका होती।
कानों में जब स्वर गूँजता तो लगता,
काश! मैं गायिका होती।
जब कोई सामाजिक कार्यक्रम देखती तो लगता,
काश! मैं समाज सेविका होती।
जब मंच पर कवि-सम्मेलन सुनती तो लगता,
काश! मैं कवयित्री होती।
जब किसी महिला को खेलते देखती तो लगता,
काश! मैं प्लेयर होती।
और तो और...
जब कोई अपने हक की लड़ाई लड़ता तो लगता,
काश! मैं लॉयर होती।
फिर एक दिन...
फिर एक दिन हुआ यूँ कि मैं शिक्षिका बन गई,
और मेरे हर अरमानों की अर्थी निकल गई।।
लेकिन हकीकत तो कुछ और ही निकली,
मैंने अपने एक ही पेशे में अपने सपनों वाले हर किरदार के साथ-साथ एक्स्ट्रा किरदारों की भी भूमिका देख ली।
क्योंकि स्कूल में जब अपने बच्चों को नाटक के लिए तैयार करती,
उस वक्त मैं एक नायिका बन जाती।
जब कार्यक्रम में अतिथि के लिए स्वागत गीत
और सरस्वती वंदना सिखाती,
उस वक्त मैं गायिका बन जाती।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का डांस सिखाते-सिखाते,
मैं एक नृत्यिका बन जाती।
जब खुद मंच पर संचालन करूँ,
तो मैं शायर बन जाती।
और बच्चों को खेल खिलवाते समय,
मैं एक प्लेयर बन जाती।
जब बच्चों के झगड़े निपटाकर उन्हें सही-गलत का पाठ पढ़ाती,
तब मैं लॉयर बन जाती।
बच्चों की चोट पर मरहम लगाकर,
मैं उनकी डॉक्टर बन जाती।
उनकी नई सृजनात्मक क्षमता को जगाकर,
कभी-कभी इंजीनियर भी बन जाती।
और फिर जब मेरे हिस्से में आ जाता है ईको क्लब,
तो लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करते-करते
मैं सोशल वर्कर बन जाती।
अब लगता है....
अब लगता है -
कि वाकई धन्य है शिक्षक,
जो एक साथ कई किरदार निभाता है।
और ये हुनर हर किसी के हिस्से में भी तो नहीं आता है।
केवल एक ही किरदार निभा पाए,
शिक्षक वो इंसान नहीं होता।
शायद इसीलिए शिक्षक होना हर किसी के लिए इतना आसान नहीं होता।
हर शिक्षक के प्रति प्रत्येक इंसान में मन में सम्मान होना चाहिए,
और हर शिक्षक को खुद पर भी गर्व होना चाहिए।
मुझे तो गर्व है कि मैं एक शिक्षिका हूँ,
और मैं अपने ही किरदार की नायिका हूँ।
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श्रीमती मोहिनी भालके
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