सोशल मीडिया के दौर में साहित्य का बदलता स्वरूप
विवेक रंजन श्रीवास्तव
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां रफ्तार जीवन का स्वभाव बन गई है और धैर्य धीरे धीरे दुर्लभ होता जा रहा है। सूचना से प्रतिक्रिया तक, संवाद से निर्णय तक और अभिव्यक्ति से प्रसिद्धि तक, हर चीज तत्काल चाहिए। डिजिटल तकनीक ने हमारी जीवनशैली ही नहीं बदली, हमारी सोचने, पढ़ने और लिखने की आदतों को भी प्रभावित किया है। साहित्य भी इस परिवर्तन से अछूता कैसे रह सकता है? आखिर साहित्य समाज का प्रतिबिंब है और समाज साहित्य का उपजीव्य। दोनों परस्पर सापेक्ष हैं। जब समाज की रुचियां, आवश्यकताएं और संप्रेषण के माध्यम बदलते हैं तो साहित्य के स्वरूप, विषय और अभिव्यक्ति की विधाएं भी बदलती हैं।
आज सोशल मीडिया साहित्य के इस बदलते परिदृश्य का सबसे प्रभावशाली मंच बनकर उभरा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और दूसरे डिजिटल माध्यमों ने लेखन और पाठन की दुनिया में एक नई हलचल पैदा की है। अब साहित्य के लिए पत्रिकाओं के संपादकीय चयन, प्रकाशकों की स्वीकृति और पुस्तकों के प्रकाशन की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं रही। लेखक अपनी रचना स्वयं प्रकाशित कर सकता है और कुछ ही क्षणों में उसे देश विदेश के पाठकों तक पहुंचा सकता है। अभिव्यक्ति का यह लोकतंत्रीकरण साहित्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। अनेक नए रचनाकारों को मंच मिला है, क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को नई पहचान मिली है और पाठकों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ है, जो शायद पारंपरिक साहित्यिक माध्यमों तक कभी नहीं पहुंच पाता।
इस परिवर्तन का एक दिलचस्प पक्ष साहित्यिक विधाओं की लोकप्रियता में दिखाई देता है। आज लघुकथा खूब पढ़ी जा रही है। छोटी कविताएं, मुक्तक, दोहे, हाइकु, क्षणिकाएं और कुछ पंक्तियों में भाव व्यक्त करने वाली रचनाएं सोशल मीडिया पर विशेष स्थान बना रही हैं। फिलर मैटर यानी सीमित स्थान में प्रकाशित की जा सकने वाली छोटी साहित्यिक सामग्री की मांग भी बढ़ी है। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों को भी ऐसी सामग्री चाहिए, जो कम जगह में पाठक का ध्यान आकर्षित कर सके। यह केवल पाठक की पसंद का परिणाम नहीं, बल्कि बदलते मीडिया प्रारूप और उपलब्ध समय का भी प्रभाव है।
लघुकथा की लोकप्रियता का अपना तार्किक आधार है। जीवन की व्यस्तता में पाठक ऐसी रचना चाहता है, जिसे कम समय में पढ़ा जा सके, लेकिन जो पढ़ने के बाद देर तक उसके मन में बनी रहे। एक अच्छी लघुकथा अपने सीमित कलेवर में जीवन की बड़ी विसंगति, मानवीय संवेदना या सामाजिक विडंबना को उजागर कर सकती है। इसी तरह छोटी कविता भी कुछ शब्दों में किसी गहरे अनुभव को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखती है। कबीर के दोहे इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनकी संक्षिप्तता कभी उनकी सीमा नहीं बनी, बल्कि वही उनकी शक्ति है।
इसलिए साहित्य में लघुता को साहित्यिक संकुचन मान लेना उचित नहीं होगा। समस्या तब पैदा होती है, जब संक्षिप्तता रचना की कलात्मक आवश्यकता न होकर पाठक की घटती एकाग्रता के दबाव का परिणाम बन जाती है। कम शब्दों में अधिक अर्थ कहना रचनात्मक कौशल है, लेकिन विचार को विकसित होने से पहले ही रोक देना दूसरी बात। कुछ रचनाएं स्वभावतः छोटी होती हैं, जबकि कुछ विषय विस्तार, विश्लेषण और संदर्भ की मांग करते हैं। हर विषय को कुछ पंक्तियों में समेट देने की प्रवृत्ति साहित्य के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
ख्यात कथाकार आलोक यात्री का यह सूक्त इसी संदर्भ में विचारणीय है कि सोशल मीडिया साहित्य को बोन्साई बना रहा है। बोन्साई में विशाल वृक्ष को एक छोटे पात्र में कलात्मक ढंग से विकसित किया जाता है। वह सुंदर तो होता है, लेकिन अपने स्वाभाविक विस्तार से वंचित रहता है। साहित्य के संदर्भ में यह रूपक तब सार्थक हो उठता है, जब हम किसी बड़े विचार को केवल इस कारण छोटा करने लगें कि पाठक लंबा पढ़ना नहीं चाहता। हालांकि हर छोटी रचना बोन्साई नहीं है। साहित्य की वास्तविक चुनौती अपने कथ्य के अनुरूप आकार और अभिव्यक्ति चुनने में है।
सोशल मीडिया ने साहित्य को एक नया पाठक वर्ग दिया है, लेकिन साथ ही पाठकीय व्यवहार भी बदला है। पाठक अब एक ही मंच पर कविता, समाचार, वीडियो, विज्ञापन, मनोरंजन और विचार सब कुछ देखता है। उसका ध्यान अनेक दिशाओं में बंटा हुआ है। वह किसी पोस्ट पर कुछ क्षण रुकता है और फिर अगली सामग्री की ओर बढ़ जाता है। इस परिस्थिति में लेखक के सामने पाठक को आकर्षित करने की चुनौती है। रचना का आरंभ प्रभावशाली हो, भाषा सरल हो, कथ्य में नवीनता हो और आकार ऐसा हो कि पाठक उसे पूरा पढ़ सके। यह अपेक्षा अनुचित नहीं है, लेकिन जब लेखक अपनी अभिव्यक्ति को केवल लाइक, कमेंट और शेयर की संभावनाओं के आधार पर गढ़ने लगता है, तब साहित्य की स्वायत्तता प्रभावित होती है।
एक और परिवर्तन रचनाकार और पाठक के संबंधों में आया है। पहले रचना के प्रकाशन और उस पर प्रतिक्रिया के बीच पर्याप्त समय होता था। संपादक की टिप्पणी, समीक्षकों का मूल्यांकन और पाठकों के पत्र लेखक को आत्ममंथन का अवसर देते थे। अब रचना प्रकाशित होते ही प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। लेखक तत्काल जान सकता है कि उसकी रचना कितने लोगों तक पहुंची, कितने लोगों ने पसंद किया और कितनों ने टिप्पणी की। यह संवाद की दृष्टि से उपयोगी है, लेकिन लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच भ्रम पैदा करने की आशंका भी है। लाइक की संख्या रचना की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं होती। कभी गंभीर रचना कम पढ़ी जाती है और सामान्य मनोरंजक सामग्री हजारों लोगों तक पहुंच जाती है।
सोशल मीडिया पर तात्कालिक विषयों का आकर्षण भी बढ़ा है। कोई घटना घटती है और उस पर तुरंत कविताएं, व्यंग्य, टिप्पणियां और लघुकथाएं सामने आने लगती हैं। यह समकालीनता का सकारात्मक पक्ष है। साहित्य अपने समय से संवाद करे, यह आवश्यक है। लेकिन घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया और साहित्यिक सृजन में अंतर होता है। प्रतिक्रिया में आवेग प्रधान हो सकता है, जबकि रचना के लिए अनुभव, विचार, संवेदना और परिपक्वता चाहिए। समाचार घटना का विवरण देता है, साहित्य उस घटना के पीछे छिपे मनुष्य और उसके अंतर्विरोधों को तलाशता है। यह तलाश समय मांगती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया साहित्य के लिए कोई संकट मात्र है। इसी मंच ने साहित्यिक समूहों, ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों, पुस्तक चर्चाओं और नए लेखकों के संवाद को विस्तार दिया है। दूरदराज के रचनाकार एक दूसरे से जुड़ रहे हैं। पुस्तकों की जानकारी, साहित्यिक आयोजनों की खबरें और नई रचनाओं की चर्चा व्यापक स्तर पर संभव हुई है। डिजिटल मंचों ने साहित्य के प्रचार प्रसार की संभावनाएं बढ़ाई हैं। कई बार सोशल मीडिया पर किसी छोटी कविता या लघुकथा से प्रभावित होकर पाठक पूरी पुस्तक खरीदने और पढ़ने की ओर प्रेरित होता है। इस दृष्टि से सोशल मीडिया साहित्य का विकल्प नहीं, उसका एक नया प्रवेश द्वार भी है।
प्रश्न अंततः माध्यम का नहीं, उसके उपयोग का है। लेखक को यह तय करना होगा कि वह सोशल मीडिया का उपयोग अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति के विस्तार के लिए कर रहा है या उसकी लोकप्रियता की शर्तों के अनुसार स्वयं को ढाल रहा है। उसे पाठक की रुचि का ध्यान रखना चाहिए, लेकिन अपनी दृष्टि और विचार की स्वतंत्रता भी बचाए रखनी चाहिए। पाठक को भी छोटी और बड़ी, दोनों तरह की रचनाओं के लिए अपने भीतर स्थान बनाना होगा।
साहित्य समय के साथ बदलता रहा है और आगे भी बदलेगा। नई विधाएं आएंगी, पुरानी विधाओं के स्वरूप बदलेंगे और अभिव्यक्ति के नए माध्यम विकसित होंगे। यह परिवर्तन स्वाभाविक है। लेकिन साहित्य की मूल शक्ति उसकी संवेदना, विचार की गहराई और जीवन को देखने की दृष्टि में निहित है। तकनीक इन गुणों को अभिव्यक्त करने में सहायक हो सकती है, उनका स्थान नहीं ले सकती।
सोशल मीडिया की रफ्तार के बीच साहित्य को अपनी गति और अपना धैर्य स्वयं निर्धारित करना होगा। उसे कुछ पंक्तियों में भी चमत्कार रचने की स्वतंत्रता हो और हजार पृष्ठों में जीवन का महाकाव्य रचने का अवकाश भी। आखिर साहित्य का उद्देश्य केवल पाठक का ध्यान खींचना नहीं, उसका ध्यान किसी सार्थक विचार पर ठहराना भी है। लोकप्रियता उसे पाठकों तक पहुंचा सकती है, लेकिन कालजयी होने के लिए उसे समय की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
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