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श्रीकृष्ण भक्ति की वैश्विक यात्रा और इस्कॉन की अलख

 

श्रीकृष्ण भक्ति की वैश्विक यात्रा और इस्कॉन की अलख

विवेक रंजन श्रीवास्तव

(साहित्य अकादमी भोपाल से सम्मानित लेखक समालोचक, इन दिनों लंदन प्रवास पर)


श्रीकृष्ण की बाँसुरी की धुन का रहस्य यही है कि वह किसी एक भाषा में नहीं बजती। हर संवेदनशील हृदय उसे अपनी भाषा में सुन लेता है।


मायापुर पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में गंगा और जलांगी के संगम के निकट, नवद्वीप के पास बसा वह तीर्थ है, जिसे आज दुनिया भर के कृष्ण भक्त श्रद्धा से देखते हैं। कोलकाता से लगभग 130 किलोमीटर उत्तर में स्थित मायापुर को गौड़ीय वैष्णव परंपरा में चैतन्य महाप्रभु की जन्मभूमि माना जाता है। पश्चिम बंगाल सरकार के अनुसार यहाँ प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक तीर्थयात्री आते हैं। यही मायापुर आज इस्कॉन का विश्व मुख्यालय भी है।


लेकिन कृष्ण भक्ति की इस आधुनिक वैश्विक यात्रा का एक दूसरा सिरा हजारों किलोमीटर दूर न्यूयॉर्क में दिखाई देता है। 1965 में न्यूयॉर्क के बंदरगाह पर जब 69 वर्षीय अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी पहुँचे होंगे, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि भारत से आया यह वृद्ध संन्यासी पश्चिमी दुनिया में श्रीकृष्ण के नाम की ऐसी अलख जगाएगा, जो समय के साथ विश्वव्यापी होती जाएगी।


उनके पास न कोई बड़ी संस्था थी, न धनबल और न प्रचार का आधुनिक तंत्र। उनके पास केवल श्रीमद्भगवद्गीता का विश्वास, श्रीमद्भागवत की परंपरा, चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन साधना और श्रीकृष्ण के प्रति अविचल प्रेम था। यही उनकी पूँजी थी, जिसे वे संसार के साथ बाँटना चाहते थे।


जुलाई 1966 में न्यूयॉर्क के लोअर ईस्ट साइड में एक छोटे से स्टोरफ्रंट से इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस, अर्थात इस्कॉन की औपचारिक स्थापना हुई। बाद में यही संस्था संसार में हरे कृष्ण आंदोलन के नाम से पहचानी गई।


यह घटना जितनी धार्मिक और चमत्कारी है, उतनी ही सांस्कृतिक भी। प्रश्न केवल इतना नहीं कि श्रीकृष्ण का महात्म्य भारत से अमेरिका पहुँचा। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के अनेक हिस्सों के लोग आखिर इस्कॉन के माध्यम से श्रीकृष्ण की ओर क्यों आकर्षित हुए।


इस प्रश्न का उत्तर इन दिनों यहाँ लंदन में रहते हुए निकट ही हर्टफोर्डशायर के लेचमोर हीथ में स्थित भक्तिवेदांत मनोर को देखकर कुछ अधिक स्पष्ट हुआ। इस्कॉन का यह केंद्र कृष्ण भक्ति की वैश्विक यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।


यह वही पिगॉट्स मनोर है, जिसे बीटल्स के प्रसिद्ध संगीतकार जॉर्ज हैरिसन ने 1973 में खरीदा और कृष्ण भक्तों को समर्पित कर दिया। उस समय लंदन का बरी प्लेस मंदिर बढ़ती हुई संख्या के कारण छोटा पड़ने लगा था। जॉर्ज हैरिसन ने भक्तों के लिए लंदन से बहुत दूर न होने वाली किसी बड़ी ग्रामीण संपत्ति की तलाश में सहयोग किया। फरवरी 1973 में पिगॉट्स मनोर का क्रय पूरा हुआ और उसे इस्कॉन को समर्पित कर दिया गया। बाद में इसका नाम भक्तिवेदांत मनोर रखा गया।


यह प्रसंग इसलिए असाधारण है कि लोकप्रिय पश्चिमी संगीत की दुनिया का एक विश्वविख्यात कलाकार भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपनी निजी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित कर दिया। जॉर्ज हैरिसन और कृष्ण भक्ति का संबंध केवल संपत्ति के दान तक सीमित नहीं था, वह संगीत और आत्मिक खोज से भी गहराई से जुड़ा हुआ था।


1968 में लंदन पहुँचे इस्कॉन के प्रारंभिक भक्तों से जॉर्ज हैरिसन की निकटता बढ़ी। 1969 में उन्होंने भक्तों के साथ मिलकर हरे कृष्ण महामंत्र की रिकॉर्डिंग और उसके प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राधा कृष्ण टेंपल के नाम से जारी रिकॉर्डिंग को उन्होंने निर्मित किया और उसने व्यापक लोकप्रियता प्राप्त की।


जॉर्ज की अपनी आध्यात्मिक यात्रा भी इस समय तेजी से गहरी हो रही थी। बीटल्स के भारत आगमन और भारतीय दर्शन, संगीत तथा साधना के प्रति उनकी रुचि ने उनके जीवन की दिशा बदली थी। कृष्ण नाम के प्रति उनका आकर्षण आगे चलकर उनके संगीत में भी दिखाई दिया। उनका प्रसिद्ध गीत ‘माय स्वीट लॉर्ड’ हरे कृष्ण महामंत्र को लोकप्रिय सांस्कृतिक संसार तक ले जाने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है।


1973 में जब भक्तिवेदांत मनोर इस्कॉन के पास आया, तब वह केवल एक बड़ी ग्रामीण संपत्ति नहीं रही। वह ब्रिटेन में कृष्ण भक्ति के विस्तार का नया आधार बन गया। उसी वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर, 21 अगस्त 1973 को श्रील प्रभुपाद ने वहाँ श्री श्री राधा गोकुलानंद के विग्रहों की स्थापना स्वयं की। आज यह स्थान ब्रिटेन में कृष्ण भक्ति का प्रमुख तीर्थ, शिक्षा और सामुदायिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है।


भगवान श्रीकृष्ण विश्वस्तरीय आराध्य क्यों बने, क्यों और कैसे इस्कॉन इसका माध्यम बना, इन प्रश्नों का उत्तर शायद स्वयं श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में छिपा है।


श्रीकृष्ण केवल मंदिर के देवता नहीं हैं। वे जीवन के ऐसे विराट पात्र हैं, जिनमें बालक की चंचलता है, मित्र की आत्मीयता है, प्रेम की कोमलता है, राजनीतिज्ञ की व्यावहारिक बुद्धि है, योद्धा का साहस है और युद्धभूमि में अर्जुन के रथ पर खड़े हुए दार्शनिक की विराट दृष्टि भी है।


वे युद्धभूमि में गीता कहते हैं और वृंदावन में बाँसुरी बजाते हैं। वे कर्म का संदेश देते हैं और प्रेम के पर्याय हैं। वे संसार से पलायन नहीं सिखाते, संसार के बीच रहते हुए अपने कर्तव्य को अर्थपूर्ण बनाना सिखाते हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में श्रीकृष्ण पथ प्रदर्शन करते हैं।


शायद यही कारण है कि आधुनिक मनुष्य, जो बाहर से सुविधासंपन्न होकर भी भीतर से बेचैन है, श्रीकृष्ण में एक ऐसा संवाद खोज पाता है जो उसकी अपनी भाषा बोलता है। आज का मनुष्य तकनीक से जुड़ा है, लेकिन अपने भीतर से कटता जा रहा है। उसके पास सूचना बहुत है, पर मानसिक शांति कम होती जा रही है। संपर्क बहुत हैं, आत्मीयता कम है। विकल्प बहुत हैं, स्पष्ट दिशा कम है।


ऐसे समय में गीता के कृष्ण उससे पूछते हैं कि तुम्हारे जीवन का केंद्र क्या है। कर्म क्यों करते हो। सफलता किसके लिए है। और सबसे बढ़कर, क्या तुम अपने भीतर के भय से मुक्त हो पाए हो।


इस्कॉन की सफलता को समझने के लिए केवल उसके मंदिरों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी असली शक्ति यह रही कि उसने कृष्ण भक्ति को जीवन पद्धति के रूप में आम मनुष्य के सामने रखा। कीर्तन, भगवद्गीता, प्रसाद, सामुदायिक जीवन, सेवा, पुस्तकें, उत्सव और सरल जीवन को एक साथ जोड़ दिया।


जिस पश्चिमी युवक के लिए भारत की आध्यात्मिकता रहस्य और दूर की चीज थी, उसके लिए हरे कृष्ण महामंत्र ने उसे गाने, नाचने और सामूहिक रूप से आंतरिक उत्साह अनुभव करने का अवसर दिया।


यह सब इस्कॉन ने एक व्यवस्थित ढंग से किया। श्रील प्रभुपाद ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि केवल दर्शन सुनाकर किसी समाज को नहीं बदला जा सकता। दर्शन को अनुभव में उतरना होगा। इसलिए इस्कॉन के मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं बने। वे संगीत के केंद्र बने, भोजन के केंद्र बने, अध्ययन के केंद्र बने और संवाद के केंद्र बने।


रविवार का प्रेम भोज, जिसे प्रभुपाद ने 1966 में आरंभ किया था, आज दुनिया के अनेक इस्कॉन केंद्रों में सामाजिक और आध्यात्मिक मिलन का माध्यम है। वहाँ जिह्वा भोजन के साथ शायद भक्ति का स्वाद भी ग्रहण करती है। सात्विक भोजन शरीर की क्षुधा शांत करता है और हरिनाम संकीर्तन उसी जिह्वा से सामूहिक आनंद में अभिव्यक्त होता है।


इस्कॉन के लिए कृष्ण साहित्य का पुस्तक रूप में वितरण सामान्य प्रकाशन गतिविधि मात्र नहीं, ज्ञान वितरण का अभियान रहा है। श्रील प्रभुपाद ने संस्कृत और वैष्णव परंपरा के ग्रंथों को अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में उपलब्ध कराया। उनकी प्रमुख पुस्तकों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत का संदेश दुनिया के अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों तक पहुँचा।


भारत में जो कृष्ण कभी ब्रज की गलियों, मंदिरों, लोकगीतों और भक्ति काव्य में सहज रूप से उपस्थित थे, वही श्रीकृष्ण न्यूयॉर्क की सड़कों पर झाँझ और मृदंग के साथ नृत्य करती भक्तों की टोली को आह्लादित करने लगे। लंदन में रथयात्रा निकली। यूरोप के नगरों में जन्माष्टमी मनाई जाने लगी। विश्वविद्यालयों में भगवद्गीता पर चर्चा होने लगी।


यह केवल धर्म का विस्तार नहीं था। यह भारतीय संस्कृति का एक असाधारण वैश्वीकरण था।


1967 में सैन फ्रांसिस्को में पहली इस्कॉन रथयात्रा आयोजित हुई। इसके बाद यह आयोजन दुनिया के अनेक नगरों तक पहुँचा। आज रथयात्रा में भारतीय मूल के लोग ही नहीं, स्थानीय नागरिक, पर्यटक और विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोग भी सम्मिलित होते हैं।


श्रीकृष्ण भक्ति की इस वैश्विक यात्रा में भोजन की भूमिका भी कम रोचक नहीं है। भारत में प्रसाद केवल भोजन नहीं, भगवत कृपा का प्रतीक है। इस्कॉन ने इसी भाव को सामाजिक सेवा से जोड़ा। फूड फॉर लाइफ और उससे जुड़े खाद्य सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया के अनेक हिस्सों में भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस्कॉन की वर्तमान आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसके विभिन्न खाद्य सेवा प्रयासों के माध्यम से तीन अरब से अधिक भोजन परोसे जा चुके हैं। भारत में अन्नामृत फाउंडेशन विद्यालयों में प्रतिदिन 12 लाख से अधिक पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने का उल्लेख करता है।


यह उस कृष्ण की छवि को रेखांकित करता है जो केवल मंदिर में भोग स्वीकार नहीं करते, बल्कि भूखे मनुष्य तक भोजन पहुँचाने की प्रेरणा भी बनते हैं। इस तरह जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ वाली भारतीय लोक चेतना का एक आधुनिक रूप यहाँ दिखाई देता है।


इस्कॉन की आधिकारिक वर्तमान जानकारी के अनुसार दुनिया में उसके 900 से अधिक केंद्र, 110 से अधिक शाकाहारी रेस्तराँ और हजारों स्थानीय सामुदायिक समूह हैं। ये आँकड़े समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन इनसे आंदोलन के वैश्विक विस्तार का अनुमान लगाया जा सकता है।


श्रीकृष्ण की यह भाव यात्रा केवल संस्थागत विस्तार की कहानी नहीं होनी चाहिए। क्या कृष्ण भक्ति केवल मंदिरों में बढ़ेगी या मनुष्यों के जीवन में कृत्य के रूप में भी उतरेगी। यह प्रश्न आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।


इस्कॉन के सामने भी आने वाले समय में नेतृत्व विकास, भक्तों की देखभाल, शिक्षा, युवा पीढ़ी तक पहुँच, डिजिटल माध्यमों का विस्तार और वैश्विक स्तर पर संस्थागत क्षमता को मजबूत करने जैसी चुनौतियाँ हैं। आखिर जिस पीढ़ी तक पहुँचना है, वह मंदिर तक आने से पहले अपने मोबाइल पर दुनिया से साक्षात्कार कर रही है। इसलिए कृष्ण की कथा अब केवल मुद्रित पुस्तक या प्रवचन तक सीमित नहीं रह सकती।


इसी संदर्भ में मायापुर विशेष महत्व रखता है। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में गंगा और जलांगी के संगम के पास स्थित यह स्थान इस्कॉन का विश्व मुख्यालय है और गौड़ीय वैष्णव परंपरा में चैतन्य महाप्रभु की जन्मभूमि के रूप में श्रद्धेय है। पश्चिम बंगाल सरकार भी इसे चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा प्रमुख तीर्थ मानती है और प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक तीर्थयात्रियों के आने का उल्लेख करती है।


मायापुर इस दृष्टि से केवल इस्कॉन का प्रशासनिक केंद्र नहीं है। वह चैतन्य की संकीर्तन परंपरा, वैष्णव भक्ति और आधुनिक वैश्विक कृष्ण चेतना के बीच एक जीवंत सेतु है।


मायापुर आज इस वैश्विक यात्रा के अगले अध्याय की तैयारी कर रहा है। वहाँ टेंपल ऑफ द वेदिक प्लैनेटेरियम, अर्थात वैदिक तारामंडल मंदिर, इस्कॉन की वैदिक ज्ञान, कला, स्थापत्य और आधुनिकता को एक साथ लाने की महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में विकसित हो रहा है। वर्तमान आधिकारिक घोषणा के अनुसार इसका भव्य उद्घाटन 1 नवंबर 2027 से आरंभ होने वाले तीन महीने के समारोह के रूप में निर्धारित है। यह आयोजन श्रील प्रभुपाद की 50वीं तिरोभाव वर्षगाँठ से जुड़ा है।


मायापुर और लंदन के भक्तिवेदांत मनोर को एक साथ रखकर देखें तो कृष्ण भक्ति की इस महान वैश्विक यात्रा का एक रोचक भूगोल स्पष्ट होता है। एक ओर गंगा और जलांगी के किनारे का वह बंगाल है, जहाँ चैतन्य का संकीर्तन था। दूसरी ओर लंदन के निकट हरे भरे परिवेश में खड़ा वह मनोर है, जिसे एक पश्चिमी रॉक संगीतकार ने कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित कर दिया। और इनके साथ न्यूयॉर्क की वह छोटी सी जगह है, जहाँ 1966 में प्रभुपाद ने इस्कॉन की नींव रखी।


एक ही भक्ति धारा ने मायापुर से न्यूयॉर्क, न्यूयॉर्क से लंदन और लंदन से संसार की ओर अपना वैश्विक रास्ता बनाया है।


यहाँ एक और बात ध्यान देने योग्य है। श्रील प्रभुपाद के लिए कृष्ण चेतना केवल किसी एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति पर आरोपित करने का अभियान नहीं थी। इस्कॉन की स्थापना के मूल उद्देश्यों में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार, भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत में वर्णित कृष्ण चेतना का प्रचार, सामूहिक संकीर्तन, सरल जीवन और पुस्तकों के प्रकाशन तथा वितरण जैसे उद्देश्य स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।


शिक्षा भी भविष्य का महत्वपूर्ण आधार है। इस्कॉन से जुड़े विभिन्न शैक्षणिक प्रयासों में भारत के विद्यालयों से लेकर यूरोप के भक्तिवेदांत कॉलेज और ब्रिटेन के अवंती विद्यालयों तक अनेक प्रयोग दिखाई देते हैं। यदि शिक्षा मनुष्य को केवल रोजगार नहीं, जीवन की समझ भी दे सकती है, तो कृष्ण का दर्शन इस संवाद में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।


श्रील प्रभुपाद ने जिस समय न्यूयॉर्क में कृष्ण नाम संकीर्तन आरंभ किया था, उस समय दुनिया शीतयुद्ध, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक उथल पुथल के दौर से गुजर रही थी। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन मनुष्य की मूल बेचैनी नहीं बदली।


आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य की बुद्धि और सृजनात्मकता के सामने नए प्रश्न खड़े कर रही है। सामाजिक माध्यम उसकी एकाग्रता को बाँट रहे हैं। उपभोक्तावाद उसकी इच्छाओं को लगातार बढ़ा रहा है और पर्यावरणीय संकट उसे अपने जीवन की दिशा पर पुनर्विचार करने को बाध्य कर रहा है। युद्ध फिर उन्माद का रूप ले रहे हैं और परमाणु शक्ति से संपन्न दुनिया अपने ही बनाए विनाश के भय से सहमी हुई है।


ऐसे समय में श्रीकृष्ण का संदेश फिर प्रासंगिक दिखाई देता है।कृष्ण कहते हैं, कर्म करो, पर कर्म के फल के अहंकार में मत डूबो। वे मनुष्य को अपने स्वधर्म को पहचानने और भीतर से स्थिर होने की शिक्षा देते हैं। यह संदेश किसी एक धर्म, भूगोल या भाषा की संपत्ति बनकर नहीं रह सकता। शायद इसी में कृष्ण की वैश्विकता का रहस्य है।


भारत ने कृष्ण को दुनिया को दिया, लेकिन कृष्ण जब दुनिया में पहुँचे तो उन्होंने भारत को भी नया आईना दिखाया। विदेश की धरती पर किसी पश्चिमी युवक को मृदंग बजाते, किसी यूरोपीय महिला को राधा कृष्ण के पद गाते और किसी अमेरिकी परिवार को गीता पढ़ते देखकर भारतीय मन को भी कभी कभी अपने ही घर की भूली हुई धरोहर का मूल्य समझ में आता है।


शायद आने वाले समय में कृष्ण की सबसे बड़ी आवश्यकता मंदिरों से अधिक मनुष्य के मन में होगी। जिस दिन तकनीक मनुष्य को और अधिक शक्तिशाली बना देगी, उस दिन उसे यह याद दिलाने वाला कोई कृष्ण भी चाहिए होगा कि शक्ति का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, संयम भी है।


जिस दिन दुनिया के पास भोजन की अधिकता और मन में भूख की कमी होगी, तब भी उसे प्रेम चाहिए होगा। जिस दिन संवाद के साधन अनंत होंगे, तब भी आत्मीयता दुर्लभ होगी।


और तब कहीं दूर किसी नगर की सड़क पर फिर मृदंग बजेगा, करताल उठेंगे और स्वर एक साथ कहेंगे, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।


शायद वही क्षण होगा जब दुनिया को समझ आएगा कि कृष्ण भारत से बाहर नहीं गए हैं। वे केवल मनुष्य के भीतर प्रवेश करने के लिए भारत की सीमाओं से बाहर निकले हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

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