रेल के डब्बे के रिश्ते
विवेक रंजन श्रीवास्तव
स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही भीड़ दरवाजे पर अटक गई। भीतर से रोने की आवाज बाहर तक आ रही थी।
डिब्बे के भीतर एक जवान लड़का अपनी मां के पार्थिव शरीर के पास हतप्रभ बैठा था। सफर के बीच ही उनका देहांत हो गया था।
नियम कहता था कि शव को अगले बड़े स्टेशन पर उतार कर कागजी कार्यवाही पूरी की जाए। टीटी ने वही किया। उसने सख्त स्वर में कहा कि आगे यात्रा संभव नहीं, नियम अनुमति नहीं देते।
लड़के ने सिर उठाया। आंखें सूखी थीं, शायद आंसू चुक चुके थे। विनती करते हुए बोला, मां की आखिरी इच्छा थी कि गांव की मिट्टी में जाए। बस दो स्टेशन और हैं।
टीटी ने नियमावली निकाली। जैसे वही अंतिम सत्य हो। उसने कुछ धाराएं गिनाईं। आसपास खड़े लोग चुप रहे। नियम सचमुच साफ थे।
तभी एक बुजुर्ग महिला आगे आई। उसने मृत देह के चरण छुए और धीरे से बोली, बेटा रो क्यों नहीं रहे।
लड़का फूट पड़ा। डिब्बे में सिसकियां भर गईं। भीड़ का चेहरा बदल गया। अभी तक जो यात्री थे, अब वो सब शोकाकुल लोग थे।
किसी ने कहा, हम जिम्मेदारी लेते हैं। किसी ने टी टी से आग्रह किया।
टीटी ने फिर नियमावली खोली, पर इस बार अक्षर धुंधले थे। उसने किताब बंद की और धीमे स्वर में बोला, अगले दो स्टेशन तक मैं कुछ नहीं देखूंगा।
गाड़ी चल पड़ी। डिब्बे में सन्नाटा था, पर वह सन्नाटा नियमों का नहीं, रेल के डब्बे के रिश्तों का था।
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