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प्रेमनाथ : एक सितारा

 

प्रेमनाथ : एक सितारा, एक शहर और एक सिनेमाघर की  कहानी


(जन्मशती पर विशेष)


विवेक रंजन श्रीवास्तव


किसी शहर की पहचान केवल उसकी सड़कों, इमारतों और बाजारों के साथ कुछ चेहरो, कुछ जगहें और कुछ स्मृतियां भी उसकी पहचान का हिस्सा होती हैं। 

जबलपुर के लिए एम्पायर टॉकीज ऐसी ही एक जगह थी। मैंने भी इस सिनेमाघर में बैठकर फिल्में देखी हैं। तब शायद मैं नहीं जानता था कि जिस पर्दे पर हम फिल्मी सितारों को देखकर रोमांचित होते हैं, उसका रिश्ता हिंदी सिनेमा के एक ऐसे अभिनेता से है, जिसकी कहानी जबलपुर की मिट्टी से गहराई से जुड़ी है। बाद में जब समझ विकसित हुई तो ज्ञात हुआ कि वह प्रसिद्ध अभिनेता थे प्रेमनाथ।


21 नवंबर 1926 को पेशावर में जन्मे प्रेमनाथ का परिवार देश विभाजन के बाद जबलपुर आकर बस गया था। उनके पिता राय करतारनाथ पुलिस विभाग में अधिकारी थे। प्रेमनाथ ने जबलपुर के गवर्नमेंट साइंस कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। इस तरह जबलपुर उनकी जन्मभूमि भले नहीं था, लेकिन उनकी किशोरावस्था, पारिवारिक जीवन और सांस्कृतिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा अवश्य था।


प्रेमनाथ के जीवन का एक रोचक प्रसंग एम्पायर टॉकीज से जुड़ा है। बताया जाता है कि विद्यार्थी जीवन में एक बार वे दीवार फांदकर बिना टिकट फिल्म देखने पहुंच गए। टिकट चेकर ने उन्हें पकड़ लिया और थप्पड़ जड़ दिया। उस अपमान ने उनके भीतर एक संकल्प जगा दिया। उन्होंने तय किया कि एक दिन इस सिनेमाघर को खरीदेंगे। समय बदला। प्रेमनाथ फिल्मी सितारा बने और उन्होंने सचमुच एम्पायर टॉकीज का स्वामित्व हासिल कर लिया। इससे भी रोचक बात यह है कि टॉकीज के उद्घाटन पर उन्होंने उसी कर्मचारी को सम्मानित किया, जिसने कभी उन्हें थप्पड़ मारा था। अपमान का यह कैसा सुंदर प्रतिकार था! बदला लेने के बजाय सम्मान देना। यह प्रसंग प्रेमनाथ के व्यक्तित्व का एक अनूठा मानवीय पक्ष सामने लाता है।


एम्पायर टॉकीज का अपना गौरवशाली इतिहास था। अंग्रेजों के समय बनी यह इमारत अपनी विशाल स्क्रीन और स्थापत्य के लिए जानी जाती थी। यहां अंग्रेजी फिल्में खूब दिखाई जाती थीं। जेम्स बॉन्ड की फिल्मों का भी अपना आकर्षण था। बाद में राजश्री बैनर और राज कपूर की फिल्मों के पुनर्प्रदर्शन ने इसे दर्शकों का प्रिय सिनेमाघर बनाए रखा।

टॉकीज अपने अंतिम समय में भी अंग्रेजी फिल्मों के लिए ही जानी जाती थी।

टीवी का दौर आया और एम्पायर टॉकीज ढह गई , पर प्रेमनाथ जी की दुनिया भर के दर्शकों के मन में बना सम्राज्य आज भी कायम है।

 प्रेमनाथ का बंगला भी इसी परिसर के निकट था। उनकी लाल रंग की शेवरले कार जबलपुर की सड़कों पर अलग ही पहचान रखती थी। स्थानीय मैकेनिक रमजान कारीगर उसकी देखभाल करते थे। एक फिल्मी सितारे का शहर से ऐसा घरेलू रिश्ता आज कल्पना जैसा लगता है।


प्रेमनाथ का एक कम चर्चित पक्ष जबलपुर के रंगमंच से उनका आत्मीय जुड़ाव था। पिता के निधन पर जब वे जबलपुर आए, तब शहीद स्मारक में राजकला मंदिर संस्था का नाटक राह के कांटे देखा। प्रस्तुति से प्रभावित होकर उन्होंने तीन स्थानीय कलाकारों को मुंबई आने का निमंत्रण दिया। वे बाद में नाटकों की रिहर्सल देखने भी पहुंचते रहे। जिलहरी घाट पर नर्मदा में तैरने के बाद सीधे रिहर्सल में पहुंच जाना उनकी सहज जीवनशैली का हिस्सा था। कलाकारों के बीच बैठकर पृथ्वी थिएटर के अनुभव सुनाना और अचानक समोसे मंगवाने की फरमाइश करना उन्हें किसी दूर बैठे फिल्मी सितारे के बजाय अपना आत्मीय साथी बना देता था।


जबलपुर के रंगकर्मी उनका एक कथन आज भी याद करते हैं। वे कहते थे, घोड़ा अस्तबल में नहीं बिकता, बाजार में बिकता है। उनका आशय साफ था। फिल्मों में काम करना है तो मुंबई जाओ, संघर्ष करो और अपने हुनर को बड़े मंच पर आजमाओ। उन्होंने स्थानीय कलाकारों को केवल सलाह नहीं दी, बल्कि उनकी मदद भी की। एम्पायर टॉकीज में नाटकों की रिहर्सल के लिए जगह उपलब्ध कराई। 

उन्होंने मीरा नामक फिल्म बनाने की योजना भी बनाई थी। इसमें जबलपुर के कलाकारों को अवसर मिलना था। रेडियो उद्घोषक मनोहर महाजन का चयन भी हुआ, लेकिन यह योजना परदे तक नहीं पहुंच सकी। यह प्रेमनाथ के भीतर बसे उस कलाकार का प्रमाण है, जो अपने शहर की प्रतिभाओं को आगे बढ़ते देखना चाहता था।


प्रेमनाथ का व्यक्तित्व अभिनय तक सीमित नहीं था। वे लेखक, उपन्यासकार, निर्माता और आध्यात्मिक जिज्ञासु भी थे। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में उपन्यास लिखे। कैलाश पर्वत की यात्रा की और अपने अनुभवों पर कैलास दर्शन नामक वृत्तचित्र बनाया। फिल्म निर्माण में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन उनकी रचनात्मक जिज्ञासा कभी कम नहीं हुई। उनके पुत्र मोंटी नाथ द्वारा निर्मित वृत्तचित्र "अमर प्रेमनाथ : लास्ट ऑफ द टाइटन्स" में उनके व्यक्तित्व के अनेक अनदेखे पहलू  हैं।


तीसरी मंजिल, जॉनी मेरा नाम, धर्मात्मा, बॉबी, रोटी कपड़ा और मकान तथा कालीचरण जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया। उन्होंने नायक के रूप में शुरुआत की, खलनायक की भूमिकाओं में अपनी अलग पहचान बनाई और फिर चरित्र अभिनेता के रूप में भी दर्शकों का दिल जीता। उनकी आवाज, व्यक्तित्व और संवाद अदायगी की अपनी विशिष्ट छाप थी।


एम्पायर टॉकीज को प्रेमनाथ ने कभी अपने सपनों का सिनेमाघर बनाया था, वह जर्जर होने के कारण अगस्त 2024 में ध्वस्त कर दी गई। अब वह इतिहास हो गईं। बची हैं तो केवल स्मृतियां।


प्रेमनाथ की जन्मशती पर उन्हें याद करना केवल एक अभिनेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह जबलपुर की उस सांस्कृतिक विरासत को याद करना भी है, जहां सिनेमा और रंगमंच एक दूसरे के करीब थे। जहां मुंबई का सितारा अपने शहर के कलाकारों के बीच बैठकर समोसे खाता था और उन्हें बड़े सपने देखने की प्रेरणा देता था।


मैं जब एम्पायर टॉकीज में देखी अपनी फिल्मों को याद करता हूं, तो लगता है कि उस सिनेमाघर के साथ मेरी भी कुछ स्मृतियां ध्वस्त हुई हैं। इमारत चली गई, पर्दा उतर गया, लेकिन प्रेमनाथ की कहानी अब भी जीवित है। शायद कलाकार की असली अमरता यही है। वह केवल अपनी फिल्मों में नहीं, किसी शहर की सामूहिक स्मृति में भी जीवित रहता है।


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