खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे
विवेक रंजन श्रीवास्तव
दुनिया में खंभे की उपयोगिता का कोई अंत नहीं। चुनाव हार जाएँ, युद्ध में मात खा जाएँ, शेयर बाजार में निवेश डूब जाए या नोबेल पुरस्कार पाने के लिए तमाम जुगाड़ भिड़ाने के बावजूद नामांकन और सिफारिशों की पतंग आसमान में ही कट जाए, खंभा हर जगह काम आता है।
अपनी नाकामी का ठीकरा फोड़ने के लिए इससे विश्वसनीय पात्र दूसरा नहीं। खंभा न प्रतिवाद करता है, न प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है। शायद इसीलिए खिसियानी बिल्ली की पहली पसंद खंभा है। बिल्ली अब केवल पंजे नहीं मारती, सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाती है, विरोधियों को षड्यंत्रकारी बताती है और अपनी हार को ऐतिहासिक अन्याय घोषित कर देती है।
चुनावों में यह दृश्य आम है। जनता कभी-कभी गणित बिगाड़ देती है। मतदाता को समझाने निकले महारथी स्वयं नहीं समझ पाते कि जनता ने उनकी समझदारी को ही नकार दिया है।
फिर ईवीएम पर सवाल उठते हैं, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बहस होती है और हार के लिए कभी मौसम, कभी मशीन, कभी मीडिया जिम्मेदार ठहराए जाते हैं।
आत्ममंथन का दरवाजा बंद रहता है, आरोपों की खिड़की खुली रहती है। बिल्ली को यह स्वीकार नहीं कि खंभा निर्दोष है और पंजे उसके अपने हैं।
वैश्विक राजनीति में भी यही खेल बड़े बजट और आधुनिक हथियारों के साथ जारी है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का तनाव हो या अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा , या अमेरिका ईरान का तू डाल डाल मै पात पात वाला युद्ध हो
,हर पक्ष अपनी कार्रवाई को मजबूरी और दूसरे की कार्रवाई को संकट का कारण बताता है।
प्रतिबंधों के जवाब में प्रतिप्रतिबंध लगते हैं, टैरिफ शुल्क बढ़ते हैं और फाइनली महँगाई का बिल आम आदमी के घर पहुँचता है।
महाशक्तियाँ अपनी प्रतिष्ठा बचाती हैं, छोटे देशों की अर्थव्यवस्थाएँ पंजों के निशान सहती हैं। युद्धभूमि में बारूद चलता है और कूटनीति में शब्दों के नाखून।
नोबेल पुरस्कार की आकांक्षा भी कभी-कभी इसी मनोविज्ञान का दिलचस्प प्रदर्शन बन जाती है। शांति का नोबेल पाने की इच्छा रखने वाला यदि अपने हर युद्ध को ऐतिहासिक शांति प्रयास और हर आलोचना को विरोधियों की साजिश बताने लगे, तो पुरस्कार समिति के सामने भी एक विचित्र प्रश्न खड़ा हो सकता है। दुनिया में शांति स्थापित करने से अधिक ऊर्जा यदि अपनी शांति-प्रतिष्ठा स्थापित करने में लग जाए, तो नोबेल न मिलने पर खंभा ही अंतिम आश्रय बचेगा। तब बिल्ली कहेगी कि पुरस्कार समिति राजनीति से प्रेरित है, निर्णायक पक्षपाती हैं और दुनिया उसके योगदान को समझ नहीं पाई। पुरस्कार भले न मिले, खंभे को एक नया अंतरराष्ट्रीय आश्रय अवश्य मिल जाएगा!
शेयर बाजार में भी यही सिद्धांत लागू है। बाजार चढ़े तो निवेशक अपनी दूरदृष्टि का ढोल पीटता है, गिरे तो विदेशी निवेशकों, सरकार और वैश्विक परिस्थितियों को कोसता है। मुनाफे में प्रतिभा अपनी, नुकसान में जिम्मेदारी दूसरों की! कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में भी पुरानी आदत सुरक्षित है। मशीन गलत उत्तर दे तो कभी प्रश्न की भाषा पर, कभी उपयोगकर्ता की समझ पर दोष मढ़ दिया जाता है। तकनीक नई है, बहाना पुराना।
सोशल मीडिया ने खंभे को वैश्विक मंच दे दिया है। तथ्य सामने आने से पहले निष्कर्ष तैयार हो जाते हैं। भूल स्वीकार करने वाले को कमजोर और गलती पर अड़े रहने वाले को दृढ़ व्यक्तित्व का प्रमाणपत्र मिलने लगता है। क्षमा की जगह स्पष्टीकरण, स्पष्टीकरण की जगह आरोप और आरोप की जगह नया विवाद परोस दिया जाता है। दर्शक तमाशा देखते हैं, मंच संचालक लोकप्रियता गिनते हैं और खंभा अगली चोट की प्रतीक्षा करता है।
लेकिन खंभे को नोचने से न चुनाव जीते जाते हैं, न युद्ध समाप्त होते हैं, न अर्थव्यवस्था सुधरती है और न पुरस्कार बेवजह बांटे जा सकते हैं।
गलती स्वीकार करना पराजय नहीं, सुधार की पहली सीढ़ी है। समस्या तब होती है जब प्रतिष्ठा बचाने की चिंता सच पहचानने से बड़ी हो जाती है। अपनी भूल का आईना तोड़कर उसके टुकड़ों में दूसरों का चेहरा खोजने वाला जीवन भर खंभे बदलता रहता है, अपनी आदत नहीं सुधारता।
राजस्थान में अभिवादन के लिए प्रचलित आत्मीय शब्द ‘खम्मा घणी’ है। खंभा नोचने वाली बिल्ली से कोई कहे कि बहन, पंजे चलाने से पहले थोड़ा ठहर, तो वह शायद इसे भी अपने सम्मान पर हमला समझ बैठे। लेकिन खंभे को प्रणाम करने की नौबत आने से पहले आत्ममंथन कर लेना ही बेहतर है। आखिर खंभा तो अपनी जगह खड़ा रहेगा।
खंभा कुत्तों के मूत्र विसर्जन का सार्वजनिक स्थल
बना रहेगा ।
दुनिया को खंभे नोचने वाली बिल्लियों से अधिक उन साहसी लोगों की जरूरत है, जो अपनी गलती स्वीकार कर सकें। वरना खंभे पर खरोंचें बढ़ती रहेंगी, बिल्लियाँ खिसियाती रहेंगी और यथार्थ बदलाव दूर विवश खड़ा मुस्कराता रहेगा।
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