खजुराहो के प्रस्तर
विवेक रंजन श्रीवास्तव
खजुराहो मन्दिर शिखरों पर पड़ती धूप , हौले से फिसलती है उन आलिंगनबद्ध देहों को सहलाती हुई
तो पाषाण प्रतिमाओ के बीच मौन संवाद समझ पाता हूं मैं, नीचे
हरे लान पर बैठे हुए ।
मेरे और तुम्हारे बीच के
वे 'अनकहे चैट्स',
जो हमने टाइप तो किए,
पर कभी 'सेंड' ही नहीं कर पाए,
हमारे शब्द वे, जो ड्राफ्ट बनकर ही रह गए ।
लगता है वे सब इन
प्रस्तर मूर्तियों में सदियों से जाग रहे हैं।
मूर्तिकार ने इन
प्रस्तर मूर्तियों की आँखों में संकोच नहीं ,
उकेरा है शाश्वत निर्मल प्रेम।
हमारी तरह मैसेज करने के बाद 'ब्लू टिक' का
इंतज़ार नहीं है, इन्हें
न ही 'लास्ट सीन' के समय को देख कोई मनगढ़ंत अनुमान लगाती हैं ये जीवंत प्रतिमाएं।
बस प्रेम का होना ही
शाश्वत सत्य है यहां।
देखता हूँ जब इन आलिंगनबद्ध
युगल मूर्तियों को निकट जाकर
तो मुझे अपनी रग रग में
तुम्हारी छुअन की ,
पहली
सिहरन का अहसास होता है।
जमाने की इस 'फास्ट-फॉरवर्ड' भागदौड़ में
हम बहुत पीछे कहीं छोड़ आए हैं, जो अहसास।
ये मौन मूर्तियाँ कर रही हैं
उद्घोषणा
सदियों से वही शाश्वत संदेश
"प्रेम पाप नहीं",
सृष्टि की किताब में सबसे सुंदर कविता है
प्रेम।
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