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एक कविता

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव


एक कविता

एक नज़्म 

एक गीत 

एक ग़ज़ल हो तुम 

तरन्नुम में ,

बहर में मुकम्मल सांचे सी ढली, डली हो तुम

हर हरकत पर तुम्हारी काफिया मुस्कुराता है

रदीफ़ गुनगुनाता है।

सानेट सी सुगठित है तुम्हारी देह । 

और मन  हाइकु सा

नियमों में बंधा 

पर तांका से गहरे भाव

समेटे हुए ।


और मैं एक मुक्त छंद 

महज कुछ शब्द 

बिखरे हुए । 

बना दिया है 

नियति ने मुझे

तुम्हारा शीर्षक।

 


खजुराहो के प्रस्तर

विवेक रंजन श्रीवास्तव

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