सुना जो ख्वाब में रोटी संग फरिश्ते मिलेंगे
गरीब के बच्चे ये सुन के....भूखे ही सो गए
के आज फिर इस शहर में एक मजबूर माँ बाप
भूखो-बेबसी के आगे........तक़दीर पे रो गए
ये सोच के कि तक़दीर आस्मानो में उड़ेगी
कितना बोझा मज़दूर अपनी पीठ पे ढो गए
कि ख्वाबों के एक टापू के गम में रोते हो
इस समंदर में कितने शहर जमींदोज़ हो गए
की अतीत के उस शहर में घूमने जब हम गए
यादों की इस माला में फूल कितने पिरो गए
अधूरी हसरतों के बादल आँखों से बरसे तो
इस शहर को फिर गले गले तक हाये भिगो गए
सब बुज़ुर्गो से तबियत से दुआए ले लीजिये
दुनिया में लौटते नही लोग इक बार जो गए......................विपुल
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