मेरी आँखों की बरसातो को पन्नो की स्याही बना डाला
ये कैसी शायरी और कैसा शायर...या इलाही बना डाला......
राह्-ए-इश्क में दुनिया ने हम दोनों को दी ये आजादी
चुनने के लिए हमारे सामने कुआ और खाई बना डाला
इस दुनिया में मेहताब को कौन पूछता है बुझने के बाद
मतलब निकल गया तोफिर मुझेभी पहाड़ से राई बना डाला
ऐसे झूम के बही है यहाँ इस बार इंकलाब की तेज़ हवाये
हर दीवाने आशिक को अब आजादी का सिपाही बना डाला
बनाने वाले ने भी क्या कहर बरपाया है जमाने के लिए
आसमानों में बादल और बिजली को हम राही बना डाला
कि सबने अपनी नफरतों से हमे तोड़ना तो खूब चाहां विपुल
मगर हमने सिमेटा यूँ ख़ुद को कि प्यार का राही बना डाला........विपुल
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