मैंने शायरी में बनाई,खयालो की बस्ती एक दिन
खत्म हो जाएगी ये,सब लुटा के मस्ती एक दिन
कहते जिसको इश्क यहाँ,फितने से वो कम तो नही
उठा ले वो सर से,सबकी सरपरस्ती एक दिन
ग़ालिब मियां खप गए, और हम कि अब भी ये सोचते है
शायद रंग लाये,कि ये फाकामस्ती एक दिन
सिर्फ़ बहारो तक है यहाँ इस दीदारे फूल का मज़ा
खाक होगी गाफिल,ये तेरी हस्ती एक दिन
मैंने नसीब के जुआघर मे,सब कि दाँव पे लगा दिया
नसीब में लिखी निकली,हाय शिकस्ती एक दिन ....
कि रोज़ के नाज़ो नखरे है, तो रोज़ भी तू. उठा 'विपुल'
चलती नहीं हसीनो पे,जबरदस्ती एक दिन .........................
विपुल
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