मैं हू...तन्हाई हो,और यादें तेरी हों
सुबहैं मेरी हों.....और शामें तेरी हों
इस क़दर बे-इंतेहा भीड़ में खो चुका हूँ मैं
के रास्ते भर ख़ुद से बातें तेरी हों
कि ख़ुद को ये समझा के हर रोज़ सोते है हम
शायद ख्वाब में मुलाकाते तेरी हो
कि हम भी झूम झूम कर फिर भीगेंगे उसमें
अबकी मौसमों में बरसाते तेरी हो
फिर उसमें चाँद की भला जरूरत ही क्या है
ग़र मेरी ज़िन्दगी में रातें तेरी हो..................विपुल
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