जीवन का -----------
जीवन का क्या भरोसा
पगडंडियों पर चलते-चलते
कब आत्मा साथ छोड़ देगी
जीवन का क्या भरोसा
किस मोड़ पर चलते-चलते
शरीर से नाता तोड़ लेगी
शरीर का ढांचा छोड़ चलेगी
जीवन का क्या भरोसा
मुस्कान भरते प्यारे चेहरे
न जाने कब रो पड़ेंगे
सांस कब तन का साथ छोड़ेगी
जीवन में चलते-चलते
जीवन का क्या भरोसा
हाथ-पैर की हलचल
कब धीमी पड़ जाएगी
शरीर का रंग कब बदल जाएगा
परिवार में रहते-रहते
जीवन का क्या भरोसा
धरती से रिश्ता कब टूट जाएगा
मुस्कान भरते-भरते
दिन में अंधेरा कब छा जाएगा
जीवन सफर तय करते-करते
जीवन का क्या भरोसा
विनोद कुमार सीताराम दुबे शिक्षक भांडुप मुंबई महाराष्ट्र
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