फिल्में समाज का आईना होतीं है|किसी दौर की फिल्में उस दौर के समाज की सोच,प्रगति तथा संस्कार से प्रभावित होतीं हैं|फिल्में समाज को नये आयाम भी देती है क्योंकि ये कल्पनाओं पर भी आधारित होतीं हैं|जब सिनेमाहालों में फिल्में प्रदर्शित होती है दर्शकों में युवाओं की संख्या सबसे अधिक होती है जिससे फिल्मों में उनकी दिलचस्पी का पता चलता है|मनोवैग्यानिक पहलू यह है कि युवा दर्शक फिल्मों के नायक से खुद को जोड़कर फिल्में देखते है|अधिकतर युवाओं के आदर्श फिल्मी सितारे होते हैं|इस प्रकार जाने-अनजाने फिल्म के नायक का चारित्रिक गुण/अवगुण का प्रभाव युवाओं के मानसिक पटल पर लम्बे समय तक अंकित रहता है|युवा पर आधारित फिल्म बनाने वाले सम्मानित फिल्मकारों को चाहिए कि वो उसी धटना या कहानी को फिल्म का रुप दे जिसे देखकर युवाओं में नैतिक मुल्यों तथा वैग्यानिक सोच का भाव पैदा हो तथा ऐसी कहानियों को फिल्मों से दूर रखें जिसे देखने पर कुंठा का भाव पैदा हो|जिस फिल्म का नायक भोगवादी तथा चोर होगा तथा नायिका लगभग नंगी तथा बिलासी होगी उसको देखने वाले युवा लड़के व लड़कीयों का चरित्र कैसा होगा ?
~विनोद यादव "निर्भय"
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