अब हमें यह फिक्र नहीं कि वो रूठ जाएगी ,
ये पागल मछली समन्दर से दूर कहाँ जाएगी।
किनारों पर मछेरों के जाल पड़े हैं फैले हुए,
फंस गई तो चाह के भी न लौट पाएगी।
उसे अपने हुस्न का गुरूर है हमारे ख़ता से,
हमारी ग़ज़ल में लफ्ज़ बन तैरती नजर आएगी।
बहुत मना लिया उसने मुझे छल कपट फरेब से,
हम जो रूठे इस बार तो देखती रह जाएगी।
मेरी नज्मों में उसकी छाया मौजूद रहेगी ताउम्र,
नाम मिटा तो गुमनामी के अंधेरों में खो जाएगी।
ये तेरे ही गुनाहों का साहिल है 'दवे' मत डर,
उसकी जवानी तेरे आंसुओं में डूबती नज़र आएगी।
विनोद कुमार दवे
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