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मेरा पिया घर आया*

 

मेरा पिया घर आया*

उमेश कुमार सक्सेना


“सुनो… आज रात दरवाज़ा खुला रखना।”

फोन पर यह सुनते ही नंदिनी का हाथ काँप गया।

“क्यों?”

“मैं आ रहा हूँ।”

कुछ क्षण दोनों तरफ खामोशी रही।

फिर नंदिनी ने धीमे से पूछा—

“सच में?”

“हाँ… इस बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”

फोन कट गया।

नंदिनी कुछ देर वहीं बैठी रही। फिर अचानक उठी और अलमारी खोल दी।

सालों बाद आज उसने वह गुलाबी साड़ी निकाली, जो राघव ने शादी की पहली सालगिरह पर उसे दी थी।

साड़ी को सीने से लगाकर वह मुस्कुरा दी।

“देखते हैं… तुम्हें याद भी है या नहीं।”

राघव पिछले पाँच वर्षों से दूसरे शहर में नौकरी कर रहा था।

शुरुआत में हर महीने आता था।

फिर दो महीने में।

फिर छह महीने में।

अब तो उसकी आवाज ही घर आने लगी थी।

बेटा अक्सर पूछता—

“मम्मी, पापा फोन में रहते हैं या हमारे घर में?”

नंदिनी हर बार हँस देती।

लेकिन आज वह सवाल उसे भीतर तक चुभ गया।

उसने पति की पसंद का खाना बनाया।

कमरे में साफ चादर बिछाई।

तकिए के नीचे वह पुराना खत रख दिया, जो राघव ने शादी के कुछ दिन बाद लिखा था—

“तुम्हारे बिना घर, घर नहीं लगता।”

रात के ग्यारह बज गए।

बारह भी।

राघव नहीं आया।

नंदिनी बार-बार दरवाज़े की ओर देखती।

आखिर मोबाइल बजा।

राघव था।

“नंदिनी…”

“हाँ?”

उसकी आवाज में घबराहट थी।

“अगर मैं देर कर दूँ तो…”

नंदिनी ने बीच में ही कहा—

“देर से आना, लेकिन आना जरूर।”

उधर कुछ क्षण चुप्पी रही।

फिर राघव बोला—

“मैं कोशिश करूँगा।”

फोन कट गया।

नंदिनी का चेहरा उतर गया।

“कोशिश करूँगा?”

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद वह आने का वादा नहीं कर रहा था… विदा लेने की तैयारी कर रहा था।

सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई।

नंदिनी दौड़कर पहुँची।

दरवाज़ा खोला।

सामने राघव खड़ा था।

वही चेहरा…

लेकिन आँखों में अजीब-सी थकान।

नंदिनी कुछ कहती, उससे पहले राघव ने पूछा—

“तुमने अभी तक वह साड़ी संभालकर रखी है?”

नंदिनी की आँखें भर आईं।

“तुम्हें याद थी?”

राघव मुस्कुराया।

“तुम्हें भूलना होता तो पाँच साल पहले भूल जाता।”

नंदिनी ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया, फिर अचानक रोक लिया।

“तुम इतने दिन बाद आए हो… और सबसे पहले साड़ी याद आ रही है?”

राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं… तुम याद आ रही थीं। साड़ी तो बहाना है।”

नंदिनी की आँखों से आँसू छलक पड़े।

तभी राघव ने जेब से एक लिफाफा निकाला।

“ये क्या है?” उसने पूछा।

“मेरी नौकरी छोड़ने का पत्र।”

नंदिनी सन्न रह गई।

“तुमने नौकरी छोड़ दी?”

“हाँ।”

“क्यों?”

राघव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“पाँच साल में बहुत पैसा कमाया… लेकिन एक दिन बेटे ने फोन पर पूछा—‘पापा, आप हमारे घर कब शिफ्ट हो रहे हो?’”

वह रुक गया।

“उस दिन समझ आया… मैं नौकरी नहीं कर रहा था, अपने ही घर से किराए पर रह रहा था।”

नंदिनी कुछ बोल नहीं पाई।

राघव ने धीरे से पूछा—

“अब भी जगह है मेरे लिए?”

नंदिनी ने आँसू पोंछे और दरवाज़ा पूरा खोल दिया।

“पाँच साल से इसी दरवाज़े पर तो खड़ी हूँ।”

राघव अंदर आया।

पीछे से बेटा दौड़ता हुआ आया और उससे लिपट गया।

“पापा, अब आप फिर कब जाओगे?”

राघव ने उसे कसकर सीने से लगा लिया।


पीछे से बेटा दौड़ता हुआ आया और राघव से लिपट गया।

“पापा, अब आप फिर कब जाओगे?”

राघव ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखें भर आईं।

“अब कहीं नहीं जाऊँगा बेटा… तुम्हारे साथ रहने के लिए ही तो वापस आया हूँ।”

बेटे ने मासूमियत से पूछा—

“पक्का?”

राघव ने उसके माथे को चूमते हुए कहा—

“पक्का।”

नंदिनी दरवाजे के पास खड़ी सब देख रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

राघव ने उसकी ओर देखा।

“रो क्यों रही हो?”

नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की—

“कुछ नहीं… बस सोच रही हूँ, जिस आदमी के आने का इंतज़ार करते-करते पाँच साल निकल गए, वह आज सामने खड़ा है… इसलिए यकीन नहीं हो रहा।”

राघव उसके पास आया और उसका हाथ थाम लिया।

“नंदिनी, इन पाँच सालों में मैं तुम्हारे लिए बहुत कुछ कमाता रहा… लेकिन सबसे जरूरी चीज खोता रहा।”

“क्या?”

राघव ने धीमे से कहा—

“तुम्हारे साथ बिताए हुए दिन।”

नंदिनी की आँखें छलक उठीं।

उसने राघव के कंधे पर सिर रख दिया।

कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

बाहर सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी।

नंदिनी ने धीरे से कहा—

“जानते हो, मैं हर रात दरवाज़ा बंद करते हुए यही सोचती थी कि शायद कल तुम आ जाओगे।”

राघव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

“और मैं हर रात सोने से पहले यही सोचता था कि काश… कल मुझे घर जाने की वजह मिल जाए।”

नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

“अब मिल गई?”

राघव मुस्कुराया।

“नहीं… अब वजह नहीं चाहिए। अब मेरा घर ही मेरी वजह है।”

बेटा दोनों के बीच आकर खड़ा हो गया और उनके हाथ पकड़ लिए।

उस छोटे-से घर में उस सुबह कोई बड़ा उत्सव नहीं था।

बस तीन लोग थे—

एक पिता, जो बहुत देर से लौटा था…

एक पत्नी, जिसने इंतज़ार को प्रेम की तरह जिया था…

और एक बच्चा, जिसे आखिरकार फोन में रहने वाला पिता नहीं, घर में रहने वाला पिता मिल गया था।

रिश्ते हमेशा पैसों से नहीं टूटते, कभी-कभी दूरी से भी टूटने लगते हैं।

इसलिए अपनों के लिए सिर्फ कमाइए नहीं…

कभी-कभी उनके पास बैठकर यह भी महसूस कराइए कि वे आपकी कमाई नहीं, आपकी जिंदगी हैं।

 


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