Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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*मौत के बाद स्वर्ग मिलेगा।*

 

*मौत के बाद स्वर्ग मिलेगा।*

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उमेश कुमार सक्सेना



इस उम्मीद में इंसान पूरी जिंदगी बहुत प्रयास करता है।

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*कोई उपवास करता है,*

*कोई दान-धर्म करता है,*

*कोई तीर्थयात्रा करता है,*

*तो कुछ लोग भगवान से मन्नतें मांगते हैं।*

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स्वर्ग जैसे कोई नई हाउसिंग सोसाइटी जैसा लगता है,

जहाँ एक छोटा सा फ्लैट पाने के लिए  *पुण्य के अंक* (पॉइंट्स) जमा करने पड़ते हैं...


*लेकिन एक पल ठहरकर यह भी सोचिए...*


*क्या पता... शायद हम पहले से ही स्वर्ग में ही जी रहे हों?*


सुबह उठते ही एक बार अपने आसपास ध्यान दीजिए।


० एक बटन दबाओ तो अंधेरा रोशनी में बदल जाता है।

० दूसरा बटन दबाओ तो पंखा घूमने लगता है।

० तीसरा बटन दबाओ तो ठंडी हवा पूरे कमरे में भर जाती है।

० नल खोलो तो पानी बहने पलगता है।

० गैस जलाओ तो कुछ ही मिनटों में खाना तैयार।

० जेब से मोबाइल निकालो तो पूरी दुनिया आपकी हथेली में आ जाती है।

० हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले आपके प्रिय लोग भी कुछ ही सेकंड में आपके सामने दिखाई देते हैं।


*इतनी सारी अद्भुत सुविधाएं...*


 लेकिन हम इसे बहुत सामान्य समझते हैं। हम ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे यह सब हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो।

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*एक बार कल्पना कीजिए...*


दो सौ साल पहले का कोई राजा आज आपके घर आए, तो शायद वह अपने राजमहल में वापस भी न जाना चाहे।


*वह आश्चर्य से पूछेगा —*


० "यह क्या?" — गर्म पानी!

० "और यह क्या?" — ठंडी हवा।

० "यह क्या है?" — पूरी दुनिया की जानकारी।

० "यह क्या?" — दस मिनट में घर आने वाला खाना।


*तब वह हंसकर कहेगा —*


*"मैंने पूरी जिंदगी राज किया, युद्ध जीते, बेहिसाब संपत्ति हासिल की... लेकिन ऐसी सुविधाएं मुझे कभी नहीं मिलीं।"*


यह बिल्कुल सच है!

*आज एक आम इंसान भी कई सुविधाओं के मामले में पुराने जमाने के सबसे शक्तिशाली राजाओं से भी ज्यादा अमीर है।*


*फिर भी...*

*हम खुश नहीं हैं।*

*क्यों?*


क्योंकि इंसान को जो मिल जाता है, उसकी कीमत धीरे-धीरे कम हो जाती है।

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AC चालू है — आनंद नहीं है।


बंद होता है तब ही... तकलीफ होती है।


मोबाइल है — आनंद नहीं है।

नेटवर्क चला जाए तो लगता है दुनिया ही खत्म हो गई।


अपना घर है — संतोष नहीं है।

पड़ोसी का घर बड़ा है, इसका दुख है।


अपनी गाड़ी है — तृप्ति नहीं है।

दूसरे की गाड़ी बड़ी है, उसकी चिंता है।


*यानी इंसान अपने स्वर्ग में खड़ा होकर, दूसरे के स्वर्ग से अपनी तुलना करके दुखी होता है।*


*लेकिन इसी पृथ्वी पर एक दूसरी दुनिया भी है...*


आज भी लाखों लोग एक घड़े पानी के लिए घंटों तक लाइन में खड़े रहते हैं।

लाखों परिवारों के पास पक्का मकान तक नहीं है।

दिन में दो वक्त का खाना भी तय नहीं है।

बच्चों के सपने स्कूल की चौखट तक पहुँचने से पहले ही टूट जाते हैं।

शरीर ढकने के लिए ठीक से कपड़े भी नहीं हैं।


*हम जिसे "सामान्य" समझते हैं, वे सुविधाएं ही दूसरों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा सपना हैं।*

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हमें AC का रिमोट न मिले तो गुस्सा आता है।

उन्हें धूप से बचने के लिए पेड़ की छांव तक नहीं मिलती।


हम डाइट चार्ट ढूंढते हैं।

वे लोग अगले वक्त का खाना कैसे मिलेगा, यह सोचते - सोचते सो जाते हैं।


*तब समझ आता है...*


*स्वर्ग और नरक मौत के बाद मिलने वाली जगहें नहीं हैं...*


*वे यहीं हैं...*

*इसी पृथ्वी पर...*

*इसी शहर में...*

*इसी सड़क पर...*


कभी-कभी एक ही दीवार की दो तरफ...

*एक घर का बच्चा अपना नया मोबाइल थोड़ा स्लो होने पर चिड़चिड़ाता है।*


*सामने के घर का बच्चा ऑनलाइन पढ़ने के लिए मोबाइल न होने पर रोता है।*


*एक आदमी गर्म पानी पाँच मिनट देर से आने पर शिकायत करता है।*

*दूसरा आदमी आज पानी मिल गया, बस यही काफी है कहकर ईश्वर से प्रार्थना करता है।*


*फर्क सिर्फ परिस्थिति में नहीं है...*

*फर्क दृष्टिकोण में भी है।*


कुछ लोग खराब परिस्थिति में भी मुस्कुराना सीख गए हैं।

तो कुछ लोग तमाम सुविधाएं होने के बावजूद शिकायतों से बाहर नहीं निकल पाते।


*इंसान की सबसे अजीब आदत यह है कि —*


*उसके पास जो नहीं है, उसका हिसाब वह रोज करता है...*

*लेकिन उसके पास जो है, उसका हिसाब वह कभी नहीं करता।*

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हर रात सोने से पहले बस पाँच बातें लिखकर देखिए —


*१ आज मैं सांस ले रहा हूँ।*

*२ आज मेरे पास पीने के लिए पानी है।*

*३ आज मुझे खाना मिला।*

*४ आज मेरे पास रहने के लिए एक घर है।*

*५ आज मेरे अपने मेरे साथ हैं।*


शायद हमारी जिंदगी ही बदल जाएगी।

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*शायद "स्वर्ग" कोई जगह नहीं है... वह एक अनुभव है।*


*वैसे ही "नरक" भी कोई जगह नहीं है... उस अनुभव को भूल जाना ही नरक है।*


*हमारे पास जो है उसके लिए कृतज्ञ होना ही स्वर्ग है।*

*जो मिला है उसे भूलकर, शिकायतों में जीना ही नरक है।*

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*मौत के बाद क्या होता है, यह कोई पक्के तौर पर नहीं जानता।*

*लेकिन जीते-जी ही हमें यह सुंदर पृथ्वी, सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, खाने के लिए अन्न, प्यार करने वाले हमारे लोग और एक बटन दबाने से मिलने वाली*

*अनगिनत सुविधाएं मिली हैं।*

*इतना सब होने के बावजूद अगर हम हमेशा दुखी रहें...*

*तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा?*

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*शायद ईश्वर भी हंसकर कहता होगा —*

"मैंने तुझे स्वर्ग में ही रखा है... लेकिन तू वहां भी शिकायतों का दफ्तर ही खोलकर बैठा है!"


*इसलिए आज से शिकायतें मत गिनिए...*


*० "कृतज्ञता" गिनिए।*

*क्योंकि "कृतज्ञता" वाले दिल में ही सच्चा स्वर्ग होता है।*

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