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हम सब किरदार हैं

 

हम सब किरदार हैं


कभी-कभी मन चुपके से पूछता है—

“अगर मैं न रहूँ, तो क्या बदलेगा?”

सूरज फिर भी रोज़ निकलेगा,

चाय फिर भी किसी के हाथ में उबलेगी,

और दुनिया अपनी रफ़्तार से चलती रहेगी।

कुछ दिन कोई नाम हमारा लेगा,

पुरानी तस्वीरों में हमें ढूँढ़ेगा,

आँखों में थोड़ी नमी होगी,

फिर रोज़मर्रा की भीड़

उन यादों पर धूल चढ़ा देगी।

हम समझते हैं—हमारे बिना

किसी की दुनिया अधूरी हो जाएगी,

पर सच तो यह है कि

दुनिया किसी एक इंसान पर नहीं रुकती,

हाँ… किसी का दिल ज़रूर ठहर सकता है।

किसी की सुबह हमारी आवाज़ से जुड़ी होती है,

किसी की शाम हमारे इंतज़ार से,

किसी की हँसी में हमारा नाम छुपा होता है,

और किसी की खामोशी में

हमारी कमी बोलती रहती है।

इसलिए यूँ ही अचानक

ज़िंदगी से पर्दा मत गिराना,

किसी के चेहरे की मुस्कान बनकर

थोड़ा और ठहर जाना।

क्योंकि सच यही है—

हम सब इस रंगमंच के किरदार हैं,

नाटक एक दिन खत्म होना ही है…

मगर जब तक पर्दा उठा है,

किसी के हिस्से की खुशी बनकर जीना है।

और हाँ…

जब कभी लगे कि

“मेरे बिना क्या फर्क पड़ेगा?”

तो बस इतना याद रखना—

दुनिया शायद चलती रहे,

पर किसी एक दिल की धड़कन

तुम्हारे होने से ही चल रही हो सकती है।


प्रस्तुति 


उमेश कुमार सक्सेना

बडोदरा

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