**बुज़ुर्गों की छाँव**
उमेश कुमार सक्सेना बडोदरा
समीर और नेहा अपने बच्चों के साथ एक नए शहर में शिफ्ट हुए थे। नई नौकरी, बच्चों की पढ़ाई और भागदौड़ भरी जिंदगी में नेहा परेशान रहने लगी थी।
पिछले कुछ दिनों से एक बुज़ुर्ग रोज आकर घर के ठीक बाहर लगे आम के पेड़ के नीचे चुपचाप बैठते थे। न किसी से कुछ कहते, न किसी से कुछ माँगते। बस घंटों उस पेड़ को निहारते रहते।
एक दिन समीर ने पास जाकर पूछा—
“बाबा, आप रोज यहाँ क्यों बैठे रहते हैं?”
बुज़ुर्ग ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मेरा नाम दीनानाथ है बेटा… और यह पेड़ मेरी आखिरी निशानी है।”
“कैसी निशानी?”
दीनानाथ कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले—
“यह घर कभी मेरा था। पत्नी के जाने के बाद मैंने उसकी याद में यह पेड़ लगाया था। बेटे को पढ़ाने के लिए कर्ज लिया… फिर एक दिन उसने धोखे से घर बेच दिया और मुझे वृद्धाश्रम छोड़ आया।”
समीर और नेहा स्तब्ध रह गए।
दीनानाथ ने पेड़ की ओर देखते हुए कहा—
“बेटे ने घर तो बेच दिया… मगर शायद उसे यह पता नहीं था कि घर बेचने से पिता का दिल नहीं बिकता।”
नेहा की आँखें भर आईं।
समीर ने पूछा—
“आप वापस वृद्धाश्रम क्यों नहीं चले जाते?”
दीनानाथ मुस्कुराए—
“वहाँ रहने की जगह है बेटा… मगर अपनापन नहीं। यहाँ बैठता हूँ तो लगता है, जैसे मेरी पत्नी अभी इसी पेड़ के पीछे से आवाज़ देगी—रिकूॅ के पापा, ‘जल्दी आओ, चाय ठंडी हो रही है।’ यह कहते-कहते उनकी आँखें छलक उठीं।
समीर और नेहा से रहा नहीं गया। समीर ने उनका हाथ पकड़ लिया—
“बाबा, अगर आपको मंजूर हो… तो हमारे साथ घर पर चलिए, और वहीं रहिये।”
दीनानाथ ने आश्चर्य से पूछा—
“लेकिन मैं तुम्हारा कौन हूँ?
समीर ने भर्राई आवाज़ में कहा— “आज से वही, जो मेरे अपने माँ-बाप होते… "हमारे पिता।”
दीनानाथ की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने बस इतना कहा—
“बेटा, बुज़ुर्गों को घर में रहने के लिए बहुत बड़ी जगह नहीं चाहिए… बस दिल में थोड़ी-सी जगह चाहिए।”
दीनानाथ के घर आते ही जैसे उस मकान की रौनक लौट आई। बच्चे रोज दादाजी के पास बैठकर कहानियाँ सुनने लगे। वे उन्हें संस्कार सिखाते, जीवन के छोटे-छोटे अनुभव बताते और हर शाम उनके साथ हँसते।
एक दिन नेहा ने दीनानाथ से कहा— “बाबा, आपके आने के बाद मुझे घर की चिंता नहीं रहती। बच्चों को आपके पास छोड़कर मैं अपनी नौकरी फिर से शुरू कर सकती हूँ।”
दीनानाथ मुस्कुराए—और बोले, “बेटी, घर केवल दीवारों से नहीं चलता… भरोसे से चलता है। तुम निश्चिंत होकर जाओ।”
नेहा की आँखें नम हो गईं। उसे समझ आ गया था कि जिस बुज़ुर्ग को दुनिया बोझ समझने लगी है, वही किसी घर का सबसे बड़ा सहारा हो सकता है।
उस रात समीर ने दीनानाथ के पैर दबाते हुए कहा—
“बाबा, आज समझ आया कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता।”
दीनानाथ ने उसके सिर पर हाथ रखा—
“हाँ बेटा… घर तब बनता है, जब उसमें किसी बुज़ुर्ग की दुआ और परिवार के सभी सदस्यों की हँसी साथ रहती है।”
खिड़की के बाहर हवा चल रही थी।
दीनानाथ की आँखों के सामने वही पुराना पेड़ जैसे झूम रहा था। शायद उनकी पत्नी भी कहीं मुस्कुरा रही थी। और उस दिन से वह घर सिर्फ एक मकान नहीं रहा—वह सचमुच एक घर बन गया।
बुज़ुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने से पहले एक बार अपने उस बचपन को याद करिए, जब उन्होंने आपकी उँगली पकड़कर आपको चलना सिखाया था।
जिस छाँव में तुम बड़े हुए हैं, अगर वही छाँव बुढ़ापे में हमसे दूर हो जाए, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?
बुज़ुर्ग बोझ नहीं होते—वे उस घर की जड़ होते हैं, जिसकी छाँव में आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहती हैं।
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