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तीसरी ताली की गूँज*

 

तीसरी ताली की गूँज*

By उमेश कुमार सक्सेना

शहर की एक तंग गली में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया—विहान। बचपन से ही वह दूसरों से अलग था। स्कूल में बच्चे उसकी चाल और आवाज का मजाक उड़ाते, उसे तरह-तरह के नामों से चिढ़ाते।

एक दिन रोते हुए उसने माँ से पूछा—

“माँ, मैं सबसे अलग क्यों हूँ?”

माँ ने उसे सीने से लगाकर कहा—

“बेटा, तू जैसा भी है, मेरा बच्चा है।”

लेकिन समाज के ताने बढ़ते गए। पिता भी “लोग क्या कहेंगे” की चिंता में उससे दूर होते गए। आखिर एक दिन विहान को घर छोड़ना पड़ा।

अकेला और निराश विहान भटक रहा था, तभी किन्नर समाज के कुछ लोगों ने उसे अपनाया।

“दुनिया तुझे स्वीकार करे या न करे, हम तुझे अकेला नहीं छोड़ेंगे।”

उन्होंने उसे रहने की जगह दी, भोजन दिया और सबसे बढ़कर आत्मविश्वास दिया। विहान ने तय किया कि वह अपनी पहचान को कमजोरी नहीं बनने देगा।

दिन में वह काम करता और रात में पढ़ाई। पैसे कम पड़ते तो उसके किन्नर गुरु अपनी कमाई से उसकी फीस और किताबों का इंतजाम करते।

गुरु कहते—

“जिस दिन तू बड़ा अधिकारी बनेगा, उस दिन समझना हमारा दिया हुआ हर रुपया सफल हो गया।”

विहान ने मेहनत जारी रखी। प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में वह तीन बार असफल हुआ। तीसरी असफलता के बाद उसने किताबें बंद कर दीं।

गुरु ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा—

“तू परीक्षा में हारा है, जिंदगी में नहीं। उठ और फिर कोशिश कर।”

विहान फिर जुट गया।

चौथे प्रयास में उसका चयन हो गया।

उसने सबसे पहले गुरु को फोन किया—

“गुरुजी, मैं पास हो गया।”

गुरु की आँखों में आँसू थे—

“नहीं बेटा, आज हम सब पास हुए हैं।”

समय के साथ विहान प्रशासनिक अधिकारी बन गया। जिस समाज ने कभी उसका मजाक उड़ाया था, वही अब अपनी समस्याएँ लेकर उसके सामने आता था।

एक दिन एक बुजुर्ग ने उसे पहचान लिया और शर्मिंदा होकर कहा—

“बेटा, हमने तुम्हारा बहुत मजाक उड़ाया था। हमें माफ कर दो।”

विहान मुस्कुराया—

“माफी की जरूरत नहीं। बस आगे किसी बच्चे को उसकी पहचान के कारण मत हँसाइए।”

एक समारोह में उसकी सफलता का सम्मान किया गया। मंच पर खड़े विहान ने कहा—

“मेरी पहचान मेरी कमजोरी नहीं, मेरी ताकत है। जिन्होंने मुझे ठुकराया, उन्होंने मुझे संघर्ष करना सिखाया; और जिन्होंने मुझे अपनाया, उन्होंने मुझे जीना सिखाया।”

तालियों से सभागार गूँज उठा।

समारोह के बाद विहान अपनी बूढ़ी माँ के पास गया। माँ ने उसके अधिकारी वाले कंधे पर हाथ रखकर कहा—

“बेटा, आज तू बहुत बड़ा हो गया।”

विहान माँ की गोद में सिर रखकर बोला—

“नहीं माँ, आज मैं बड़ा नहीं हुआ। आज बस आपकी वह बात सच साबित हुई है—‘तू जैसा भी है, मेरा बच्चा है।’”

माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

तभी सभागार में फिर तालियाँ गूँज उठीं।

पहली ताली सम्मान की थी, दूसरी सफलता की और तीसरी ताली उन सभी बच्चों के लिए, जिन्हें कभी उनकी पहचान के कारण ठुकराया गया था।

उस दिन तीसरी ताली उपहास की नहीं, बल्कि एक माँ के गर्व, एक गुरु के त्याग और एक इंसान के संघर्ष की गूँज थी।

और विहान ने मन ही मन संकल्प लिया—

“अब कोई बच्चा अपनी पहचान के कारण अकेला नहीं होगा।”

यही थी—तीसरी ताली की गूँज।

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