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शर्मा व्यूटी गैराज

 

शर्मा व्यूटी गैराज

उमेश कुमार सक्सेना



शहर के पुराने बाजार में एक मशहूर मोटर गैराज हुआ करता था—“शर्मा मोटर्स”। मालिक थे रामलाल शर्मा। पच्चीस साल तक उन्होंने मोटरसाइकिल से लेकर कार तक की ऐसी मरम्मत की थी कि शहर में लोग मजाक में कहते थे—

“रामलाल के हाथ में गाड़ी चली जाए तो डॉक्टर की जरूरत नहीं पड़ती।”

रामलाल का अपना एक अलग ही अंदाज था। वह अपने कारीगरों को नाम से कम और गाड़ी के पुर्जों के नाम से ज्यादा बुलाते थे।

“मुन्ना! ब्रेक !”

“कालू! कार्बोरेटर !”

“बबलू!  साइलेंसर ”

और उनका सबसे भरोसेमंद कारीगर था छोटू।

एक दिन रामलाल की पत्नी ने कहा,

“अब उम्र हो रही है। गैराज में दिन-रात तेल-ग्रीस में पड़े रहते हो। कोई साफ-सुथरा काम क्यों नहीं करते?”

रामलाल ने गंभीर होकर पूछा,

“क्या करूँ?”

पत्नी बोलीं,

“ब्यूटी पार्लर खोल लो।”

रामलाल कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले,

“मतलब… गाड़ियों की जगह अब चेहरे ठीक करूँ?”

पत्नी ने कहा,

“हाँ।”

रामलाल ने तुरंत फैसला कर लिया।

“ठीक है। आखिर चेहरा भी तो बॉडी का ही हिस्सा है!”

और बस, अगले महीने “शर्मा मोटर्स” की जगह नया बोर्ड लग गया—

“शर्मा ब्यूटी गैराज"—चेहरे और बालों की सर्विस सेंटर।”

नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—

“यहाँ सौंदर्य की मरम्मत होती है।”

पुराने सारे कारीगर भी साथ आ गए। रामलाल ने उन्हें ब्यूटी पार्लर का थोड़ा-बहुत प्रशिक्षण दिलवाया।

छोटू को हेयर कटिंग।

कालू को हेयर कलर।

बबलू को फेशियल।

मुन्ना को मसाज।

लेकिन एक चीज किसी ने नहीं बदली—उनकी भाषा!

पहले दिन ही एक महिला पार्लर में आईं।

उन्होंने कहा,

“भैया, बाल थोड़े छोटे करने हैं।”

रामलाल ने तुरंत चिल्लाकर कहा—

“छोटू! गाड़ी नंबर एक की कटिंग सर्विस आ गई है। आगे से दो इंच कम कर देना, लेकिन गाड़ी की बॉडी को नुकसान नहीं होना चाहिए!”

महिला ने चौंककर पूछा,

“गाड़ी?”

रामलाल मुस्कराए,

“अरे बहनजी, हमारी पुरानी आदत है। आप चिंता मत कीजिए, आपकी सर्विस इंसानों वाली ही होगी।”

छोटू कैंची लेकर आया।

रामलाल ने आदेश दिया—

“छोटू! पहले बोनट खोल… मेरा मतलब बाल खोल!”

पार्लर में बैठी बाकी महिलाएँ हँसी रोकने लगीं।

छोटू ने धीरे से कहा,

“मालिक, बोनट नहीं, बाल कहते हैं।”

रामलाल बोले,

“तू मुझे मत सिखा। पच्चीस साल से बोनट खोल रहा हूँ!”

महिला भी मुस्करा दीं।

कटिंग पूरी हुई।

रामलाल ने आईने में देखकर कहा—

“वाह! बिल्कुल नई मॉडल  की क्रेटा गाड़ी लग रही है। छोटू, अच्छी सर्विस की है। बिल में ‘ओवरहॉलिंग’ मत लिख देना।”

अगली ग्राहक ने कहा,

“मेरे बाल सफेद हो गए हैं। इन्हें काला करना है।”

रामलाल ने तुरंत कालू को आवाज दी—

“कालू!”

“जी मालिक।”

“पुराना पेंट उतर गया है। नई कोटिंग कर!”

महिला ने पूछा,

“क्या कहा?”

कालू ने धीरे से समझाया,

“मालिक कह रहे हैं हेयर कलर कर दो।”

रामलाल बोले,

“हाँ, वही तो! पहले हम गाड़ियों पर काला पेंट करते थे, अब बालों पर करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि गाड़ी रंगने के बाद रोड पर जाती थी और ये मैडम रंगने के बाद शादी में जाएँगी।”

सब खिलखिला पड़े।

थोड़ी देर बाद एक महिला फेशियल के लिए आईं।

रामलाल ने बबलू को आदेश दिया—

“बबलू! इनकी वाशिंग कर!”

महिला ने तुरंत पूछा,

“क्या?”

बबलू बोला,

“फेशियल, मैडम।”

रामलाल बोले,

“हाँ वही। पहले वाशिंग, फिर पॉलिश, फिर डेंट-पेंट।”

महिला हँसते हुए बोलीं,

“मेरे चेहरे पर डेंट भी है क्या?”

रामलाल ने आईने की तरफ देखते हुए कहा—

“डेंट नहीं है मैडम, लेकिन हमारी भाषा में फेशियल का मतलब ही थोड़ा बहुत डेंट-पेंट है।”

महिला हँस पड़ीं।

बबलू ने फेशियल शुरू किया।

रामलाल फिर बोले—

“बबलू! ज्यादा पानी मत डालना। पिछली बार ग्राहक का चेहरा धोते-धोते तूने पूरा इंजन भिगो दिया था!”

बबलू ने जवाब दिया—

“मालिक, चेहरा था… इंजन नहीं।”

रामलाल बोले—

“मेरे सामने ज्यादा तकनीकी मत बन!”

इसी बीच एक युवती आईं।

उन्होंने कहा,

“मुझे हेयर स्पा चाहिए।”

रामलाल ने तुरंत मुन्ना को बुलाया।

“मुन्ना! इंजन में ऑयलिंग कर!”

मुन्ना बोला,

“मालिक, हेयर स्पा है।”

रामलाल बोले,

“अरे वही तो। इंजन में तेल डालो तो स्मूथ चलता है, बालों में लगाओ तो स्मूथ दिखते हैं।”

युवती हँसते-हँसते बोलीं—

“आपका पार्लर तो बहुत अलग है।”

रामलाल ने गर्व से कहा—

“हमारे यहाँ ग्राहक को सर्विस नहीं, अनुभव मिलता है।”

एक दिन पार्लर में भीड़ कुछ ज्यादा थी।

रामलाल ने आवाज लगाई—

“छोटू! बालों की कटिंग।”

“जी!”

“कालू! कलर।”

“जी!”

“बबलू! फेशियल।”

“जी!”

“मुन्ना! मसाज।”

“जी!”

फिर अचानक उन्होंने जोर से कहा—

“और कोई खाली है?”

सभी कारीगर एक साथ बोले—

“मालिक, हम खाली नहीं हैं!”

रामलाल बोले—

“अरे मैं काम पूछ रहा था, शादी का रिश्ता नहीं!”

पूरा पार्लर ठहाकों से गूँज उठा।

धीरे-धीरे रामलाल का पार्लर मशहूर हो गया।

लोग दूर-दूर से सिर्फ इसलिए आने लगे कि यहाँ सुंदरता के साथ मुफ्त हँसी भी मिलती थी।

एक दिन वही पुराना छोटू रामलाल से बोला—

“मालिक, आपने हमारा धंधा ही बदल दिया।”

रामलाल ने मुस्कराकर कहा—

“धंधा बदला है, काम नहीं।”

छोटू बोला—

“कैसे?”

रामलाल ने सामने बैठे ग्राहकों को देखते हुए कहा—

“पहले हम गाड़ियों की खड़खड़ाहट दूर करते थे… अब लोगों के चेहरे की थकान दूर करते हैं।”

कुछ पल के लिए सब चुप हो गए।

रामलाल ने फिर माहौल हल्का करते हुए कहा—

“लेकिन एक बात है…”

छोटू ने पूछा—

“क्या?”

रामलाल बोले—

“गैराज में ग्राहक कहता था—‘भाई साहब, गाड़ी जल्दी तैयार कर दो।’”

“और यहाँ?”

“यहाँ ग्राहक कहता है—‘भाई साहब, मुझे दस साल छोटा बना दो।’”

छोटू हँसते हुए बोला—

“मालिक, दस साल छोटा बनाना तो मुश्किल है।”

रामलाल ने गंभीर चेहरा बनाया—

“मुश्किल नहीं है… बस बिल बड़ा बनाना पड़ता है!”

पूरा पार्लर फिर हँसी से गूँज उठा।

उस दिन रामलाल ने पार्लर का बोर्ड बदलवा दिया।

नया बोर्ड लगा—

“शर्मा व्यूटी पार्लर"

चेहरा आपका, भाषा हमारी…

हँसी की गारंटी।”

रामलाल दूर खड़े बोर्ड को देखते रहे और मुस्करा दिए।

उन्हें समझ आ गया था कि काम चाहे बदल जाए, हाथ का हुनर और दिल की खुशी साथ रहे तो इंसान कहीं भी अपनी जगह बना सकता है।

और उनके पार्लर में आने वाले लोग खूबसूरत होकर तो निकलते ही थे—

लेकिन मुस्कराते हुए जरूर निकलते थे।




 


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