*सा॑वली सूरत*
उमेश कुमार सक्सेना
चाची को मेरी साँवली सूरत से न जाने कैसी शिकायत थी। जब भी कोई रिश्ता आता, वह माँ के सामने ताना मारने से नहीं चूकतीं।
कहतीं, "भाभी! लड़की तो लाख गुणों वाली हो, लेकिन आजकल गुण कौन देखता है? लोग तो सुंदरता और खानदान देखते हैं। तुम्हारी बेटी के लिए कोई अच्छा रिश्ता मिलना मुश्किल है।"
माँ चुपचाप सुन लेतीं। कभी मेरी ओर देखतीं, कभी अपनी आँखों में उमड़ते आँसुओं को छिपाने की कोशिश करतीं।
एक दिन चाची ने तो हद ही कर दी।
"अरे भाभी! मेरी बात मानो तो अब ज्यादा ऊँचे खानदान और बड़े घराने के सपने देखना छोड़ दो। तुम्हारी बेटी का रंग देखकर लोग पहले ही पीछे हट जाते हैं। कहीं ऐसा न हो कि अच्छे रिश्ते की तलाश में उम्र ही निकल जाए।"
उस दिन पहली बार मैंने माँ को अकेले में रोते देखा था।
मैंने माँ का हाथ पकड़कर कहा, "माँ, क्या सचमुच मेरा साँवला होना कोई अपराध है?"
माँ ने मुझे सीने से लगाते हुए कहा, "नहीं बेटी! रंग तो प्रकृति देती है, लेकिन इंसान की असली सुंदरता उसके संस्कार और व्यवहार में होती है। एक दिन कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो तुम्हारे चेहरे से पहले तुम्हारा दिल देखेगा।"
माँ की बात सच साबित हुई। कुछ दिनों बाद एक साधारण लेकिन अच्छे संस्कारों वाले परिवार से मेरे लिए रिश्ता आया। लड़का पढ़ा-लिखा, समझदार और सुलझे हुए विचारों का था। उसे मेरा साँवला रंग नहीं, मेरा स्वभाव और व्यवहार पसंद आया। दोनों परिवारों की सहमति से हमारी शादी हो गई।
विवाह के बाद जब मैं पहली बार मायके आई तो चाची ने मुझे देखकर व्यंग्य किया।
"अरे वाह! अब तो बड़ी खुश दिखाई दे रही है। लगता है पति ने खूब लाड़-प्यार दे रखा है।"
मैं मुस्करा दी। माँ भी मुस्करा दीं।
कुछ महीनों बाद मेरे पति मुझे लेने मायके आए। उनके साधारण कपड़े देखकर चाची फिर शुरू हो गईं।
"अरे दामाद जी! आप तो बड़े सादे कपड़ों में आ गए। आजकल तो लोग अपनी हैसियत के हिसाब से कपड़े पहनते हैं। हमारी बेटी का पति देखिए, कितना बड़ा कारोबारी है।"
मेरे पति ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर बोले, "जी, कपड़ों से आदमी की हैसियत का अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है।"
चाची को शायद यह जवाब पसंद नहीं आया।
उन्होंने अपनी बेटी के लिए खरीदे गए महँगे गहनों का डिब्बा दिखाते हुए कहा, "देखिए, यह मेरी बेटी के लिए है। ऐसी चीजें हर किसी के नसीब में कहाँ होती हैं !"
मेरे पति ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी उन्होंने अपने बैग से एक छोटा-सा पैकेट निकाला और माँ के हाथों में रख दिया।
"माँजी, यह आपके लिए है।"
माँ ने पैकेट खोला तो उसमें एक सुंदर रेशमी साड़ी और एक चिट्ठी थी। चिट्ठी पढ़ते ही उनकी आँखें भर आईं।
उसमें लिखा था—
"माँजी, आपने अपनी बेटी को इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि उसने मेरे साधारण से जीवन को भी खुशियों से भर दिया है। यह छोटा-सा उपहार मेरी ओर से आपके प्रति सम्मान का प्रतीक है।"
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
चाची अब भी चुप नहीं रह सकीं।
"अरे, एक साड़ी में क्या रखा है? आजकल तो लोग अपनी सास को सोने के गहने देते हैं!"
इस बार मेरे पति ने उनकी ओर देखा और बहुत शांत स्वर में कहा—
"चाचीजी, सोने के गहने तो बाजार से खरीदे जा सकते हैं, लेकिन किसी की बेटी को सम्मान देने के लिए कोई दुकान नहीं होती। वह संस्कारों से मिलता है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा—
"चाचीजी, आप मेरी पत्नी के रंग का मजाक उड़ाती रही हैं। लेकिन कभी आपने इसके गुणों को देखने की कोशिश की? जब मैं पहली बार इसे देखने आया था, तब इसके चेहरे से ज्यादा इसके व्यवहार ने मुझे प्रभावित किया था। इसके बोलने का सलीका, बड़ों के प्रति सम्मान और दूसरों के दुख को समझने की संवेदना ने मुझे इसका जीवनसाथी बनने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली है।"
उन्होंने आगे कहा—
"इंसान का रंग उसके हाथ में नहीं होता, लेकिन उसका व्यवहार और चरित्र उसके अपने हाथ में होता है। मुझे ऐसी पत्नी नहीं चाहिए थी जो महँगे कपड़ों और गहनों से मेरी हैसियत बढ़ाए, बल्कि ऐसी चाहिए थी जो मेरे साथ मिलकर जीवन को खूबसूरत बनाए। और मुझे वह मिल गई।"
चाची का चेहरा उतर गया। उनकी बेटी भी सिर झुकाए बैठी थी।
चाची धीमे स्वर में बोलीं, "बेटा, शायद मैंने तुम्हारी भाभी के साथ बहुत गलत किया।"
मेरे पति ने मुस्कराकर कहा, "चाचीजी, किसी को उसके रंग से नहीं, उसके दिल से पहचानिए।"
उस दिन चाची की बोलती बंद थी। माँ ने मुझे गले लगा लिया। उनकी आँखों में संतोष था और मेरे मन में अपने जीवनसाथी के प्रति सम्मान और भी बढ़ गया था।
सच है, चेहरे का रंग खूबसूरती का पैमाना नहीं होता। उम्र के साथ चेहरे की चमक फीकी पड़ सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार, सच्चा प्रेम और सम्मान जीवनभर खूबसूरत बने रहते हैं।
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