*सम्मान वापसी*
उमेश कुमार सक्सेना
मैं दिखने में बहुत स्मार्ट था। मेरे पिता ने मेरी शादी एक साँवली लड़की से कर दी थी, जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थी। मुझे अपने रूप-रंग पर घमंड था और उसकी सादगी मुझे अपनी शान के खिलाफ लगती थी।
वह साधारण थी, लेकिन उसका दिल बहुत सुंदर था। मेरी पसंद का खाना बनाना, मेरी जरूरतों का ध्यान रखना और मेरी बेरुखी के बावजूद मुस्कराकर बात करना उसकी आदत थी। मगर मैं उसकी अच्छाइयों को कभी देख ही नहीं पाया।
मैं अक्सर ताना मारता, “पता नहीं पिताजी ने मेरी शादी तुमसे क्यों कर दी! मेरी पसंद का जरा भी ख्याल नहीं रखा।”
वह मुस्कराने की कोशिश करती और कहती, “शायद उन्हें विश्वास था कि एक दिन आप मुझे समझने लगेंगे।”
उसकी यह बात मुझे और चिढ़ा देती।
पिताजी मुझे समझाते, “बेटा, पत्नी का रंग नहीं, उसका मन देखना। सुंदर चेहरा कुछ वर्षों में बदल जाता है, लेकिन अच्छा व्यवहार जीवनभर साथ देता है।”
मैं हँसकर कहता, “पिताजी, ये पुरानी जमाने की बातें हैं।”
पिताजी चुप हो जाते।
कुछ समय बाद पिता जी का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद बहनों का मेरे घर आना-जाना बढ़ गया। वे मेरी पत्नी की कमियाँ निकालतीं और मैं उनकी बातों में आकर उसे और अपमानित करने लगा।
वह सब सहती रही। शायद उसे उम्मीद थी कि एक दिन मेरा व्यवहार बदल जाएगा। लेकिन मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो चुका था कि उसके आँसुओं को भी नाटक समझने लगा।
एक रात उसने मुझसे कहा, “मैंने आपसे कभी महँगे कपड़े, गहने या सुख-सुविधाएँ नहीं माँगीं। बस इतना चाहा कि आप मुझे अपनी पत्नी समझकर सम्मान दें।”
मैंने गुस्से में जवाब दिया, “अगर इतनी परेशानी है तो चली क्यों नहीं जाती?”
वह कुछ देर मुझे देखती रही। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज में दृढ़ता थी।
“एक दिन चली भी जाऊँगी। तब शायद आपको समझ आए कि घर और मकान में क्या अंतर होता है।”
मैं हँस दिया।
मुझे क्या पता था कि उसकी यह बात एक दिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बन जाएगी।
कुछ दिनों बाद वह मेरे व्यवहार से टूटकर घर छोड़कर चली गई। हमारा बेटा मेरे पास रहने लगा। मैंने खुद को समझा लिया कि अब मेरी जिंदगी पहले से बेहतर होगी।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि घर में सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी है। बेटे की देखभाल के लिए नौकर थे, उसकी हर जरूरत पूरी होती थी, मगर उसके चेहरे की उदासी बढ़ती जा रही थी।
एक दिन उसने पूछा, “पापा, मम्मी हमें छोड़कर क्यों चली गईं?”
मैंने कहा, “उसे हमारी परवाह नहीं थी।”
बेटे ने मासूमियत से पूछा, “अगर उन्हें हमारी परवाह नहीं थी, तो जब मुझे बुखार आता था, तब वे रातभर मेरे सिरहाने क्यों बैठी रहती थीं?”
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
समय बीतता गया। एक दिन बेटे ने मुझसे कहा, “पापा, मैं अपनी माँ से मिलना चाहता हूँ।”
मैंने नाराज होकर कहा, “जिसने हमें छोड़ दिया, उससे मिलने की क्या जरूरत है?”
वह शांत स्वर में बोला, “पापा, आपने हमेशा उनकी गलती बताई है। कभी उनकी भी तो कहानी सुनिए।”
उसकी बात मेरे दिल में उतर गई। आखिरकार मैं उसे लेकर उसकी माँ के घर जाने को तैयार हो गया।
मुझे लगा था कि वह किसी तरह संघर्ष कर रही होगी, लेकिन वहाँ पहुँचकर जो देखा, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया।
एक छोटे-से मकान का दरवाजा खुला। सामने मेरी पूर्व पत्नी खड़ी थी। चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, बालों में सफेदी झलक रही थी और कपड़े साधारण थे। मगर उसकी आँखों में वही ममता थी, जिसे मैं कभी पहचान नहीं पाया था।
बेटे को देखते ही वह कुछ पल के लिए जड़ हो गई।
“मेरा बच्चा!”
इतना कहकर उसने उसे सीने से लगा लिया। दोनों रो रहे थे। वह बार-बार उसके माथे को चूमती और पूछती, “तू ठीक तो है न? खाना समय पर खाता है? कोई तुझे परेशान तो नहीं करता?”
बेटा उससे लिपटकर बोला, “माँ, आपने मुझे इतना अकेला क्यों छोड़ दिया?”
उसने बेटे का चेहरा अपने हाथों में लेकर कहा, “बेटा, मैंने तुझे अपने दिल से कभी अलग नहीं किया। हालात ने मुझे तुझसे दूर कर दिया, लेकिन तेरी याद से कभी दूर नहीं कर पाए।”
मैं दरवाजे पर खड़ा सब देख रहा था।
दीवार पर बेटे के बचपन की तस्वीर लगी थी। तस्वीर के नीचे लिखा था— “मेरा बच्चा जहाँ भी रहे, खुश रहे।”
मैंने पूछा, “तुमने इसकी तस्वीर अब तक सँभालकर रखी है?”
वह बोली, “माँ के लिए बच्चा बड़ा हो जाता है, लेकिन उसकी यादें कभी बड़ी नहीं होतीं।”
मेरी नजरें झुक गईं।
कुछ देर बाद उसने बेटे से पूछा, “बेटा, कुछ खाएगा? तेरी पसंद की खीर बनाऊँ?”
बेटा मुस्कराया, “माँ, आज आपके हाथ की खीर ही खाऊँगा।”
वह रसोई में चली गई। कुछ ही देर में खीर की खुशबू पूरे घर में फैल गई। वह बार-बार बेटे के पास आकर उसे देखती, उसके बाल सहलाती और फिर रसोई में लौट जाती।
मैंने देखा कि घर में जरूरत का सामान भी बहुत कम था। उसकी हालत बता रही थी कि उसने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया है।
मैंने धीरे से पूछा, “तुमने कभी किसी से मदद क्यों नहीं माँगी?”
उसने मेरी तरफ देखा और बोली, “मदद माँगने में शर्म नहीं होती। लेकिन हर बार अपना आत्मसम्मान गिरवी रखकर जीने से बेहतर है कि इंसान कम में जीना सीख ले।”
उसके शब्द मेरे भीतर तक उतर गए।
मैंने हिम्मत करके कहा, “मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया। क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”
वह कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली, “माफ करना चाहूँ तो शायद कर दूँ, लेकिन क्या इससे वे सारे दिन लौट आएँगे, जब मैं अपने बच्चे को याद करके रोती थी? क्या वह अपमान मिट जाएगा, जो मैंने तुम्हारे घर में सहा था?”
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
वह आगे बोली, “मैं तुम्हें दोष देकर अपनी जिंदगी और कड़वी नहीं करना चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि अब किसी और औरत के साथ ऐसा मत करना। किसी की बेटी को अपने घर लाकर उसके रंग-रूप के कारण उसे छोटा मत समझना।”
तभी बेटा मेरे पास आया और बोला, “पापा, माँ ने मुझे कभी आपके खिलाफ नहीं किया। जब भी मैं आपके बारे में उनसे शिकायत करता था, वे कहती थीं कि अपने पापा का सम्मान करना। वे तुम्हारे पिता हैं।”
यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू बह निकले।
जिस औरत को मैंने जिंदगी भर अपमान दिया, उसने मेरे बेटे के मन में मेरे लिए नफरत तक पैदा नहीं होने दी थी।
मैंने बेटे से कहा, “बेटा, मैंने तुम्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन शायद वह नहीं दे पाया जिसकी तुम्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी।”
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“पापा, मुझे आपसे शिकायत नहीं है। बस अब मैं बार बार माँ से मिलना चाहता हूँ। क्या आप मुझे रोकेंगे तो नहीं?”
मैंने उसका हाथ थामकर कहा, “नहीं बेटा, अब कभी नहीं।”
चलते समय मैंने अपनी पत्नी से कहा, “अगर तुम्हें कभी किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे जरूर बताना।”
वह शांत स्वर में बोली, “मुझे सबसे ज्यादा जरूरत सम्मान की थी, जो तुम्हारे घर में कभी नहीं मिला। अब मैं किसी के सामने अपना आत्मसम्मान खोकर नहीं जीना चाहती।”
उसके शब्द सुनकर मैं भीतर तक काँप गया।
मैंने पहली बार उसके सामने सिर झुकाकर कहा, “मैं तुम्हें लेने आया हूँ। लेकिन इस बार तुम्हें अपनी मर्जी से, पूरे सम्मान के साथ घर ले जाना चाहता हूँ। मैं यह वादा नहीं करूँगा कि मैं एक ही दिन में बदल जाऊँगा, लेकिन अब तुम्हारा अपमान नहीं करूँगा। तुम्हें पत्नी का अधिकार और सम्मान दूँगा। अगर तुम मुझे एक मौका दे सको, तो मेरे साथ चलो।”
वह मेरी तरफ देखती रही। शायद उसे मेरे शब्दों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
बेटे ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “माँ, घर चलो न! इस बार पापा भी आपके साथ अच्छा व्यवहार करेंगे।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा, “मैं लौट तो सकती हूँ, लेकिन अब अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करूँगी।”
मैंने तुरंत कहा, “तुम्हें ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है। घर सिर्फ मेरा नहीं, तुम्हारा भी है।”
उस दिन मैं उसे जबरदस्ती नहीं, बल्कि उसका सम्मान करते हुए अपने साथ वापस लाया। घर पहुँचकर मैंने बहनों को भी स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मेरी पत्नी के रंग-रूप या किसी अन्य बात पर ताना मारने का अधिकार किसी को नहीं है। वह इस घर की बहू ही नहीं, मेरी जीवनसंगिनी है और उसका सम्मान करना सबकी जिम्मेदारी है।
मेरी पत्नी ने मुझे तुरंत माफ कर दिया हो, ऐसा नहीं था। उसके घाव गहरे थे। लेकिन इस बार मैंने उसे बदलने की नहीं, खुद को बदलने की कोशिश की। धीरे-धीरे हमारे बीच विश्वास लौटने लगा। बेटे के चेहरे पर भी फिर से मुस्कान दिखाई देने लगी।
एक दिन बेटे ने मेरे गले लगकर कहा, “पापा, अब हमारा घर सचमुच घर लगने लगा है।”
मेरी आँखें भर आईं।
उस दिन मुझे पिता की बात याद आई— “बेटा, पत्नी का रंग नहीं, उसका मन देखना।”
काश! मैंने उनकी बात समय रहते समझ ली होती।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY