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समझदारी

 

समझदारी* by  उमेश कुमार सक्सेना

रमेश की जिंदगी में घड़ी की सुइयाँ शायद सबसे ज्यादा तेज चलती थीं।

सुबह सात बजे घर से निकलना और रात ग्यारह बजे तक लौटना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। सरकारी नौकरी थी, जिम्मेदारियाँ बहुत थीं और काम ऐसा कि ऑफिस से निकलने के बाद भी फाइलें उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं।

घर में पत्नी सरला, दो बच्चे और बूढ़ी माँ थीं।

सुबह जब रमेश निकलते, बच्चे सो रहे होते। रात जब लौटते, तब तक बच्चे सो चुके होते।

सरला अक्सर दरवाजे पर खड़ी उनका इंतजार करती रहतीं।

“खाना लगा दूँ?”

“नहीं, बहुत थक गया हूँ।”

और रमेश कपड़े बदलकर बिस्तर पर गिर पड़ते।

शुरुआत में सरला उनकी मजबूरी समझती थीं।

फिर धीरे-धीरे इंतजार शिकायत में बदलने लगा।

“बच्चों के स्कूल में आज कार्यक्रम था, आप नहीं आए।”

“क्या करता? ऑफिस में जरूरी काम था।”

“हर बार ऑफिस ही जरूरी होता है।”

रमेश चिढ़ जाते।

“तो क्या नौकरी छोड़ दूँ?”

सरला चुप हो जातीं।

ऐसी छोटी-छोटी बातें घर में रोज होने लगीं।

कभी सब्जी में नमक ज्यादा होने पर बहस, कभी बिजली का बिल देर से भरने पर नाराजगी, कभी बच्चों की फीस को लेकर तनाव।

बात मामूली होती, लेकिन दोनों के भीतर जमा पुरानी शिकायतें उसे बड़ा बना देतीं।

एक दिन सरला ने कहा—

“आप घर में रहते हुए भी घर में नहीं होते।”

रमेश को यह बात बहुत चुभी।

उन्होंने पलटकर कहा—

“और तुम मेरी मेहनत को कभी समझना ही नहीं चाहतीं।”

उस दिन दोनों ने खाना अलग-अलग खाया।

बच्चे चुपचाप माता-पिता को देखते रहे।

समय बीतता गया।

रमेश की नौकरी चलती रही और घर में बातचीत कम होती गई।

एक रात किसी छोटी-सी बात पर झगड़ा इतना बढ़ गया कि रमेश ने गुस्से में कह दिया—

“बस! अब इस रिश्ते को खत्म कर देते हैं।”

सरला भी आहत थीं।

उन्होंने कहा—

“अगर आपको यही सही लगता है तो कर दीजिए।”

अगले दिन रमेश ने तलाक का मुकदमा दायर कर दिया।

मुकदमा चलता रहा। और वह एक ही घर में साथ साथ रहते रहे, तथा एक दूसरे की छोटी मोटी समस्याओं का निराकरण व बच्चों की परवरिश करते रहे। 

बीच-बीच में समझौते की कोशिश भी हुई, मगर दोनों का अहंकार हर बार आड़े आ गया।

अंतिम सुनवाई का दिन आया।

उस दिन रमेश अकेले अदालत पहुँचे।

कुछ देर की औपचारिक कार्रवाई के बाद अदालत ने तलाक की डिक्री दे दी।

क्लर्क ने कागज उनके हाथ में रख दिया।

रमेश ने उसे देखा।

जिस कागज के लिए वह महीनों से लड़ रहे थे, उसे हाथ में लेकर अचानक उनका मन भारी हो गया।

अदालत से बाहर निकलते ही उन्हें सरला का चेहरा याद आया।

फिर बच्चों के चेहरे।

फिर माँ की आवाज—

“बेटा, घर में मतभेद होते हैं, लेकिन घर टूट जाए तो उसकी आवाज बहुत दूर तक जाती है।”

रमेश सीढ़ियों पर रुक गए।

उन्हें याद आया—

बेटी के जन्म के समय सरला पूरी रात उनके साथ अस्पताल में थीं।

माँ बीमार पड़ी थीं तो सरला ने कई रातें जागकर उनकी सेवा की थी।

जब रमेश नौकरी के तनाव में टूट जाते थे, सरला चुपचाप उनके पास चाय रख देती थीं।

वह सोचने लगे—

“जिस स्त्री के साथ मैंने अपनी जिंदगी के इतने साल बिताए, क्या हमारी सारी कहानी सिर्फ उन झगड़ों से तय होगी?”

उनकी आँखें भर आईं।

उन्होंने जेब से तलाक की डिक्री निकाली।

कुछ पल उसे देखते रहे।

फिर धीरे से उसे मोड़कर जेब में रख लिया।

उस दिन वह सीधे घर नहीं गए।

कुछ देर अकेले पार्क में बैठे रहे। फिर घर पहुँचे।

सरला ने दरवाजा खोला।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

रमेश ने पहली बार बिना किसी शिकायत के पूछा—

“सरला… खाना खाया?”

सरला ने सिर हिला दिया।

“नहीं।”

“मेरे लिए भी बना दोगी?”

सरला कुछ क्षण उन्हें देखती रहीं। फिर धीमे से बोलीं—

“हाँ।”

बस यही दो शब्द थे।

लेकिन शायद वर्षों से बंद किसी दरवाजे की कुंडी खुल चुकी थी।

उस दिन के बाद रमेश ने अपने जीवन में एक छोटा-सा बदलाव किया।

उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी, जिम्मेदारियाँ भी कम नहीं हुईं—लेकिन घर के लिए समय निकालना शुरू किया।

देर होती तो फोन करते।

बच्चों से बातें करते।

माँ के पास बैठते। और सरला की बातें सुनते।

सरला ने भी अपनी शिकायतों के बजाय संवाद को चुना।

रिश्ता अचानक नहीं बदला।

लेकिन रोज थोड़ी-थोड़ी गर्माहट लौटती गई।

कुछ वर्षों बाद बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए।

माँ नहीं रहीं। घर शांत हो गया।

अब रमेश और सरला अक्सर शाम को बरामदे में साथ बैठते।

एक दिन पुरानी अलमारी साफ करते हुए सरला को एक लिफाफा मिला।

उन्होंने खोला तो अंदर तलाक की डिक्री थी।

वह कागज लेकर रमेश के सामने आ खड़ी हुईं।

“ये क्या है?”

रमेश चुप रहे।

सरला की आँखों में आँसू आ गए।

“उस दिन… सचमुच तलाक हो गया था?”

रमेश ने धीरे से सिर झुका दिया।

“हाँ।”

“और आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

रमेश ने उनकी ओर देखा।

“क्योंकि अदालत ने उस दिन हमें अलग कर दिया था… लेकिन अदालत से बाहर निकलते ही मुझे समझ आ गया कि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

सरला कुछ देर तक उन्हें देखती रहीं।

फिर बोलीं—

“इतने सालों में मैंने भी आपको बहुत कुछ कहा होगा।”

रमेश मुस्कुराए।

“और मैंने भी।”

“फिर हम बचे कैसे?”

रमेश ने उनका हाथ थाम लिया।

“शायद इसलिए कि हमारे बीच नाराजगी बहुत थी… लेकिन प्यार उससे थोड़ा ज्यादा था।”

सरला की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने वह कागज रमेश के हाथ से लिया और फाड़ दिया।

रमेश ने पूछा—

“इसे क्यों फाड़ दिया?”

सरला ने मुस्कुराकर कहा—

“जिस फैसले को तुमने इतने दिन छिपाकर रखा था, आज मैं उसे हमेशा के लिए खत्म कर रही हूँ।”

बरामदे में दोनों चुप बैठे रहे।

सामने डूबता सूरज था।

और उनके बीच पच्चीस साल पुराना रिश्ता—

जो एक दिन अदालत में खत्म हो गया था,

मगर दिल ने उसे खत्म होने नहीं दिया।

कभी-कभी रिश्ते इसलिए नहीं बचते कि उनमें समस्याएँ नहीं होतीं;

वे इसलिए बचते हैं क्योंकि कोई एक व्यक्ति समय रहते यह समझ लेता है कि

हर बहस जीतना जरूरी नहीं…

कभी-कभी अपने ही इंसान के सामने हार जाना ही जिंदगी की सबसे बड़ी जीत होती है।

 


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