*पितृपक्ष*
उमेश कुमार सक्सेना
शिवदयाल के जीवन की एक ही इच्छा थी—उनका बेटा रोहित पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।
उन्होंने खेत गिरवी रखे, कर्ज लिया और रोहित को इंजीनियर बनाया। पढ़ाई पूरी होते ही उसे बेंगलुरु की एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई।
रोहित की दुनिया बदल गई, लेकिन गाँव में रह रहे माँ-बाप की दुनिया वहीं की वहीं थी।
कुछ वर्षों बाद माँ का निधन हो गया। रोहित पिता को अपने साथ बेंगलुरु ले आया।
शुरू में सब ठीक रहा, फिर शिवदयाल की याददाश्त कमजोर होने लगी। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें अल्जाइमर है।
अब वे कभी चीजें भूल जाते, कभी रात में उठकर घर से निकलने लगते, कभी बिस्तर पर ही मल-मूत्र कर देते।
बहू परेशान रहने लगी।
“मैं नौकरी करूँ, घर संभालूँ और दिन-रात पापा जी को देखूँ… मुझसे नहीं होगा।”
रोहित के पास भी पिता के लिए समय कम था।
एक रात शिवदयाल को तेज खाँसी उठी। उन्होंने बेटे को पुकारा—
“रोहित… जरा मेरे पास बैठ जा।”
रोहित लैपटॉप से नजर हटाए बिना बोला—
“बाबूजी, अभी बहुत काम है। सुबह बैठूँगा।”
“हाँ बेटा… सुबह।”
लेकिन वह सुबह कभी नहीं आई।
कुछ दिनों बाद पति-पत्नी ने एक कठोर फैसला किया।
कुंभ मेले की भीड़ में वे शिवदयाल को एक जगह बैठाकर बोले—
“बाबूजी, यहीं बैठिए… हम अभी आते हैं।”
शिवदयाल बेटे का हाथ पकड़कर बोले—
“जल्दी आना बेटा।”
रोहित ने हाथ छुड़ा लिया।
वह लौटकर नहीं आया।
दो वर्ष बीत गए।
शिवदयाल को अपना गाँव याद नहीं था। घर का पता याद नहीं था। फोन नंबर याद नहीं था।
लेकिन एक नाम उनकी स्मृति में अब भी अटका हुआ था—
रोहित।
उधर रोहित ने मान लिया कि पिता शायद अब इस दुनिया में नहीं हैं।
पितृपक्ष आया तो पड़ोसियों को अपने माता-पिता का श्राद्ध करते देखकर उसके मन में भी विचार आया— मैं क्या किसी से कम हूँ,
“मै भी अपने पिताजी का श्राद्ध करूँगा ।”
घर में तरह-तरह के पकवान बने। पंडित बुलाया गया। विधि-विधान से श्राद्ध हुआ। ब्राह्मण को भोजन कराया गया और अच्छी-खासी दक्षिणा दी गई।
पंडित को विदा करके रोहित बाहर आया।
सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे एक वृद्ध बैठा था।
बड़ी दाढ़ी, मैले-कुचैले कपड़े और बेहद कमजोर शरीर।
वह लगातार रोहित के घर की ओर देख रहा था।
रोहित की नजर उस पर पड़ी तो वृद्ध की आँखों में अचानक चमक आ गई।
वह उठने की कोशिश करने लगा।
रोहित को देखकर उसने काँपता हुआ हाथ आगे बढ़ाया।
रोहित कुछ कदम उसकी ओर बढ़ा।
वृद्ध ने उसका हाथ पकड़ लिया।
और फिर वही पुरानी आदत—
उसने रोहित की कलाई को अपने अंगूठे से वैसे ही सहलाया, जैसे बचपन में स्कूल जाते समय किया करता था।
रोहित का शरीर सिहर उठा।
उसे अचानक याद आया—
जब वह छोटा था और जब डरता था तो पिता उसका हाथ इसी तरह पकड़कर कहते थे—
“डर मत बेटा, मैं हूँ न।”
रोहित ने वृद्ध के चेहरे को गौर से देखा।
दाढ़ी के पीछे छिपा चेहरा…
काँपती आँखें…
और वह स्पर्श…
उसके मुँह से चीख निकल गई—
“बाबूजी!”
वृद्ध की आँखों से आँसू बह निकले।
“रोहित… तू आ गया?”
रोहित वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
जिस पिता को वह दो वर्ष पहले मेले में छोड़ आया था, आज उसी पिता के नाम पर वह श्राद्ध करके लौटा था।
घर के भीतर पिता की तस्वीर पर माला पड़ी थी।
और सामने वही पिता जीवित बैठे थे।
रोहित ने अपना सिर उनके पैरों पर रख दिया।
“बाबूजी… मुझे माफ कर दीजिए।”
शिवदयाल उसकी ओर देखते रहे। शायद उन्हें कुछ याद नहीं था।
उन्होंने बस उसके सिर पर हाथ रखा और धीरे से कहा—
“खाना खाया बेटा?”
रोहित फूट पड़ा।
जिस बेटे ने पिता को भूख, बीमारी और अकेलेपन में छोड़ दिया था, उसकी चिंता पिता को अब भी थी।
उसने पिता को सीने से लगा लिया।
उस दिन रोहित को समझ आया कि श्राद्ध की थाली में जितना भी भोजन रख दो, वह उस एक निवाले की बराबरी नहीं कर सकता जो माँ-बाप अपने बच्चे के साथ बैठकर खाना चाहते हैं।
उसने पिता को घर के भीतर ले जाते हुए तस्वीर की ओर देखा।
तस्वीर पर लगी माला उतार दी।
और मन ही मन कहा—
“बाबूजी, आज आप का श्राद्ध नहीं हुआ… आज मेरा अहंकार मर गया है।”
उस दिन पितृपक्ष ने रोहित को एक ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसे कोई पंडित नहीं पढ़ा सकता था—
माता-पिता को मरने के बाद श्रद्धा देने से पहले, जीते-जी उनका हाथ थाम लेना चाहिए।
क्योंकि कभी-कभी उनके पास लौटने का अवसर मिलता है…
और कभी सिर्फ पछतावा।
---------------------
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY