*मिठाई की मिठास*
उमेश कुमार सक्सेना
चंद्रेश अलवानी जी का राखी का व्यवसाय है। रक्षाबंधन का त्योहार उनके लिए केवल कमाई का अवसर नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत, रिश्तों की गर्माहट और खुशियाँ बाँटने का एक खास मौका भी होता है। अपने दोनों बेटों के साथ वे इस व्यवसाय को सँभालते थे।
राखी बनाने के लिए कच्चा माल देश-विदेश से मँगवाया जाता था। कुछ काम उनकी अपनी फैक्टरी में होता, कुछ ठेके पर बाहर करवाया जाता। उनके यहाँ कुछ स्थायी कर्मचारी थे, तो कुछ ऐसे लोग भी थे, जिनके घरों का चूल्हा उनके यहाँ मिलने वाले काम से जलता था।
चन्द्रेश जी अपने कर्मचारियों को केवल काम करने वाले हाथ नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं। होली हो या दिवाली, वे मिठाई के डिब्बे मँगवाते और अपने सभी कर्मचारियों तथा कारीगरों में बाँटते। मिठाई का डिब्बा छोटा-बड़ा हो सकता था, लेकिन उसके पीछे छिपा अपनापन सबके लिए एक जैसा था।
इस बार उनके मन में एक नया विचार आया।
उन्होंने सोचा, “आजकल मिठाई इतनी महँगी हो गई है। कुछ लोग स्वास्थ्य के कारण मिठाई नहीं खाते। क्यों न इस बार मिठाई के बजाय उतने ही पैसों का कोई उपयोगी उपहार दिया जाए? किसी के घर के काम आ जाएगा, किसी के बच्चों की जरूरत पूरी हो जाएगी।
उन्होंने अपने बेटों से चर्चा की। सबको विचार अच्छा लगा। कर्मचारियों और कारीगरों को भी जब यह बात पता चली, तो वे खुश हो गए। किसी ने सोचा, घर के लिए कोई बर्तन मिल जाएगा, किसी ने सोचा, बच्चों के काम की कोई चीज आ जाएगी।
लेकिन उस भीड़ में एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसके मन में खुशी के साथ एक अनकही बेचैनी थी।
वह व्यक्ति चंद्रेश जी के यहाँ ठेके पर काम करता था। मेहनती था, ईमानदार था और अपने काम से काम रखता था। उसके परिवार में पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे थे। आमदनी इतनी थी कि किसी तरह घर का खर्च चल जाए, बच्चों की पढ़ाई हो जाए और दो वक्त की रोटी मिलती रहे।
होली पर वह दूसरों के घरों में रंगों की रौनक देखता और दिवाली पर दूसरों के आँगन में जगमगाते दीये। उसके अपने घर में भी दीया जलता था, लेकिन बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने वाला उजाला अक्सर कम पड़ जाता था।
मिठाई उसके घर में रोजमर्रा की चीज नहीं थी। कभी किसी रिश्तेदार के यहाँ से थोड़ी-बहुत आ गई, तो बच्चों के चेहरे खिल उठते। वरना मिठाई की दुकान के सामने से गुजरते हुए बच्चे अपने पिता का चेहरा देखकर ही अपनी इच्छा को मन में दबा लेते थे।
उन्हें शायद यह भी समझ आने लगा था कि हर इच्छा माँगने के लिए नहीं होती।
दिवाली नजदीक आई। एक दिन चंद्रेश जी अपने कार्यालय में बैठे थे। कर्मचारी अपने काम में लगे थे। तभी वह व्यक्ति धीरे-धीरे उनके पास आया।
उसने इधर-उधर देखा और संकोच से बोला, “साहब, आपसे एक बात कहनी थी।”
चद्रेश जी ने मुस्कराकर कहा, “हाँ, बोलो! क्या बात है?”
वह कुछ क्षण चुप रहा। जैसे शब्द उसके गले में अटक गए हों। फिर हिम्मत करके बोला साहब, इस बार आप हमें उपहार देने के बजाय मिठाई ही दे दीजिए।”
उन्होंने पूछा, “क्यों भाई? सब लोग तो उपहार मिलने से खुश हैं। तुम्हें कोई जरूरत की चीज चाहिए तो बताओ, हम वैसा ही कुछ दे देंगे।”
उसकी आँखें झुक गईं। आवाज भर्रा गई।
“साहब, जरूरत की चीजें तो जिंदगी भर खरीदनी ही पड़ती हैं। लेकिन मिठाई... मिठाई तो हमारे घर में तभी आती है, जब आप देते हैं।”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
वह अपनी बात कहता चला गया—
“जब आप मिठाई देते हैं न, साहब, तो मेरे बच्चे बहुत खुश होते हैं। डिब्बा घर पहुँचते ही उनके चेहरे ऐसे खिल जाते हैं, जैसे उनके लिए भी दिवाली आ गई हो। वे मिठाई खाते हैं, एक-दूसरे को खिलाते हैं और कई बार अगले दिन के लिए भी थोड़ा बचाकर रख लेते हैं।”
उसकी आँखों के कोने भीग चुके थे।
“साहब, आप जो उपहार देंगे, उसकी कीमत होगी, उपयोग होगा। लेकिन मिठाई का डिब्बा मेरे बच्चों के लिए सिर्फ मिठाई नहीं है। वह उनके त्योहार की खुशी है। वह उन्हें यह एहसास दिलाता है कि उनके घर में भी दिवाली आई है।”
वह थोड़ा रुका और
जिस उपहार को वे मिठाई से अधिक उपयोगी समझ रहे थे, उसी मिठाई के पीछे छिपी एक परिवार की खुशी उनसे अनजानी रह गई थी। उनके लिए मिठाई बाँटना वर्षों पुरानी एक परंपरा थी। लेकिन किसी के लिए वही परंपरा पूरे साल की सबसे मीठी प्रतीक्षा थी।
उन्हें लगा, जैसे उस छोटे-से मिठाई के डिब्बे का वजन अचानक बहुत बढ़ गया हो। उसमें चीनी, खोया और मेवे ही नहीं थे; उसमें बच्चों की मुस्कान थी, पिता की बेबसी थी और एक माँ की वह विवशता थी, जो अपने बच्चों की छोटी-छोटी इच्छाओं को चुपचाप दबाना सीख चुकी थी।
चंद्रेश जी ने उस व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखा।
भाई, तुमने आज मुझे बहुत बड़ी बात सिखा दी। मैं सोच रहा था कि लोगों को उनकी जरूरत की चीज दूँ, लेकिन यह भूल गया कि कभी-कभी जरूरत सिर्फ किसी वस्तु की नहीं, एक एहसास की भी होती है।”
उस दिन उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया।
दिवाली पर सभी कर्मचारियों और कारीगरों को मिठाई के डिब्बे दिए गए। साथ ही, जहाँ संभव हुआ, उन्होंने उनकी जरूरतों के अनुसार अलग से सहायता करने का भी निर्णय लिया।
जब वह व्यक्ति मिठाई का डिब्बा लेकर घर पहुँचा, तो उसके बच्चे दौड़कर उससे लिपट गए।
पत्नी ने उसकी ओर देखा। वह कुछ नहीं बोली। शायद वह उसके मन की बात समझ गई थी।
उस रात उस छोटे-से घर में भी दिवाली थी। दीये की लौ वही थी, छत वही थी, दीवारें वही थीं और आर्थिक परेशानियाँ भी वही थीं। लेकिन बच्चों की खिलखिलाहट ने उस घर को किसी महल से कम नहीं रहने दिया था।
उधर, चंद्रेश जी अपने घर में बैठे सोच रहे थे कि व्यापार में लाभ-हानि का हिसाब लगाना तो उन्होंने सीख लिया, लेकिन जीवन का सबसे जरूरी हिसाब आज समझ में आया है।
किसी के लिए जो मामूली है, वह किसी दूसरे के जीवन की सबसे बड़ी खुशी हो सकती है।
और उस दिवाली चंद्रेश जी ने जाना कि मिठाई बाँटने का अर्थ केवल किसी का मुँह मीठा करना नहीं है। कभी-कभी वह किसी पिता का सिर ऊँचा रखती है, किसी माँ की विवशता थोड़ी कम करती है और किसी बच्चे के मन में यह विश्वास जगाती है कि खुशियाँ उसके घर का रास्ता भी जानती हैं।
उमेश कुमार सक्सेना
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