मायका अभी भी ज़िंदा है…” ❤️
इस धरती पर बहन की सबसे बड़ी खुशी क्या होती है?
शायद अपने भाई को खुश देखकर।
यह कहानी दो भाई-बहनों के उस घर की है, जहाँ हालात भले ही अच्छे नहीं थे, मगर रिश्तों में बहुत समृद्धि थी।
घर की हालत ठीक नहीं थी। जरूरतें बहुत थीं और साधन कम। लेकिन उस घर की बहन अपने हिस्से की खुशियाँ भी अक्सर अपने भाई के नाम कर देती थी।
जब भी घर में नए कपड़े आते, माँ कहतीं—
“बेटा, अपने लिए पसंद कर लो।”
लेकिन वह कपड़े हाथ में लेकर सबसे पहले कहती—
“पहले भैया के ले लो…”
पुराने कपड़े पहनने में उसे कोई शर्म नहीं थी।
उसे तो खुशी इस बात की होती थी कि उसके भाई के पास नया कपड़ा हो।
भाई भी बहन से उतना ही प्यार करता था। उसकी छोटी-सी इच्छा भी उसके लिए बड़ी बात होती थी।
समय अपनी गति से चलता रहा।
फिर एक दिन बहन की शादी तय हो गई।
घर में शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। सब खुश थे, लेकिन भाई के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी।
उसे बार-बार लगता—
“जिस बहन ने बचपन से मेरी हर खुशी को अपनी खुशी से ऊपर रखा, वह अब इस घर से चली जाएगी…”
शादी से कुछ दिन पहले भाई ने बहन से पूछा—
“बता, तेरे लिए क्या लाऊँ? शादी है… जो चाहिए, बोल देना।”
बहन हँस दी।
“कुछ नहीं चाहिए भैया…”
भाई ने फिर पूछा—
“अरे, कुछ तो चाहिए होगा। कपड़े, गहने, कुछ और… बता तो सही।”
बहन कुछ पल चुप रही।
फिर धीमे से बोली—
“भैया, शादी के बाद कभी एक पूरा दिन मेरे घर बिताना…”
भाई मुस्कुराया।
उसे लगा बहन शायद मजाक कर रही है।
उसने कहा—
“बस इतनी-सी बात? जब मन करेगा, आ जाऊँगा।”
बहन ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराती रही।
शादी हो गई।
बहन अपने नए घर चली गई।
शुरुआत में भाई-बहन की खूब बातें होती थीं। कभी फोन पर, कभी संदेशों में।
भाई अक्सर कहता—
“अगले महीने जरूर आऊँगा।”
और बहन हर बार मुस्कुराकर कहती—
“जब समय मिले, तब आ जाना भैया…”
वह कभी शिकायत नहीं करती थी।
न यह कहती कि आप आते क्यों नहीं।
न यह कहती कि मुझे आपकी जरूरत है।
क्योंकि कुछ रिश्ते शिकायत नहीं करते…
बस इंतजार करते हैं।
ऐसे ही कई महीने बीत गए।
एक दिन भाई ने सोचा—
“आज बहन को बिना बताए मिलता हूँ।”
वह अचानक उसके घर पहुँच गया।
दरवाजा खुला।
बहन ने जैसे ही अपने भाई को सामने देखा, कुछ पल के लिए उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
वह बस उसे देखती रही।
भाई मुस्कुराया—
“क्या हुआ पगली? पहचान नहीं रही अपने भैया को?”
बहन कुछ नहीं बोली।
अचानक दौड़कर भाई के गले लग गई।
और फिर…
बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगी।
भाई घबरा गया।
उसने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा—
“क्या हुआ? सब ठीक तो है? किसी ने कुछ कहा है क्या?”
बहन ने आँसू पोंछने की कोशिश की और बोली—
“नहीं भैया… किसी ने कुछ नहीं कहा…”
भाई ने पूछा—
“फिर रो क्यों रही है?”
बहन ने भाई का हाथ अपने हाथों में पकड़ लिया।
आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
वह बोली—
“भैया… मुझे किसी चीज़ की चाहत नहीं थी।”
“न नए कपड़ों की…”
“न गहनों की…”
“न किसी महँगे तोहफे की…”फिर कुछ पल रुककर उसने कहा—
“मैं तो बस… एक दिन फिर से अपने पुराने वाले भैया के साथ जीना चाहती थी।”
भाई जैसे वहीं ठहर गया। उसे अचानक बचपन के सारे दिन याद आ गए।
वही छोटा-सा घर…
वही आँगन…
वही दोनों भाई-बहनों की लड़ाइयाँ…
एक-दूसरे से रूठना…
फिर थोड़ी देर बाद खुद ही मान जाना…
साथ बैठकर खाना…
एक-दूसरे के हिस्से की चीजें छीन लेना…
और सबसे बढ़कर—
वह बहन, जो हर बार अपनी खुशी से पहले अपने भाई की खुशी चुनती थी।
भाई की आँखें भी भर आईं। उसने बहन को गले लगाते हुए कहा—
“पगली… मुझे क्या पता था कि तेरी सबसे बड़ी इच्छा इतनी छोटी-सी है…”
उस दिन भाई ने उसके साथ बैठकर खाना खाया। हर निवाले के साथ बचपन की कोई न कोई याद सामने आती रही। कभी दोनों हँसते…कभी आँखें नम हो जातीं…
कभी बहन कहती—
“याद है भैया, बचपन में आप मेरा हिस्सा भी खा जाते थे?”
भाई हँसकर कहता—
“और तू माँ से मेरी शिकायत कर देती थी!”
उस दिन बहन ने जैसे वर्षों बाद अपने बचपन को फिर से जी लिया।
शाम को भाई जब जाने लगा तो बहन ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों में इस बार आँसू नहीं थे।
चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जो बहुत दिनों बाद लौटी थी।
वह बोली—
“आज मेरी वो अधूरी इच्छा पूरी हो गई…”
भाई ने पूछा—
“कौन-सी?”
बहन ने मुस्कुराकर कहा—
“आज लगा… मेरा मायका अभी भी ज़िंदा है।” ❤️
भाई कुछ बोल नहीं पाया।
बस बहन के सिर पर हाथ रख दिया।
याद रखिए—
रिश्ते इंतजार करते-करते कमजोर नहीं होते,
वे उपेक्षा से धीरे-धीरे खामोश हो जाते हैं।
इसलिए अगर आपकी कोई बहन है, तो कभी बिना किसी खास वजह के उसके घर चले जाइए।
उससे मत पूछिए—
“क्या चाहिए?”
बस उसके पास बैठिए।
उसके साथ खाना खाइए।
बचपन की बातें कीजिए।
क्योंकि हो सकता है…
उसे किसी चीज़ की जरूरत न हो।
उसे बस यह महसूस करना हो कि—
**“मेरा भाई आज भी वही है…
और मेरा मायका आज भी ज़िंदा है।”** ❤️
प्रस्तुति
उमेश कुमार सक्सेना
बडोदा
9557393450
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