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*ग्रुप फैमिली*

 

*ग्रुप फैमिली*

उमेश कुमार सक्सेना बडोदरा


अलीगढ़ के एक छोटे-से गाँव में रामस्वरूप प्राथमिक विद्यालय के मास्टर थे। आमदनी सीमित थी, लेकिन इकलौते बेटे अमित के  लिए सपने बहुत बड़े थे।

कभी उधार लेकर, कभी अपनी जरूरतें रोककर उन्होंने अमित को पढ़ाया।

अमित इंजीनियर बना और बेंगलुरु में नौकरी करने लगा।

एक दिन फोन आया—

“पापा, मैंने शादी कर ली है।”

माँ चुप हो गईं।

“बेटा… हमें बुलाया भी नहीं?”

“माँ, सब अचानक हुआ। आप लोग आ नहीं पाते, इसलिए…”

पिता ने फोन रख दिया।

धीरे से बोले—

“सरला, हमारा बेटा बड़ा आदमी बन गया है… शायद अब उसे हमारी जरूरत नहीं रही।”

कुछ साल बाद पिता चल बसे।

माँ अकेली रह गईं।

वह अक्सर बेटे को फोन करतीं—

“बेटा, बस एक बार आ जा… अपनी शक्ल दिखा जा। फिर चला जाना।”

दस साल निकल गए।

एक दिन अमित का फोन आया—

“माँ, मेरी शादी की दसवीं सालगिरह है। मैं तुम्हें बुला रहा हूँ।”

माँ की आँखें भर आईं।

“सच बेटा? मैं आऊँगी।”

बेटे ने हवाई जहाज की टिकट भेजी और माँ को लाने के लिए एक आदमी गाँव भेज दिया।

माँ बेंगलुरु पहुँचीं।

लेकिन बेटा उन्हें अपने घर नहीं ले गया।

होटल में कमरा बुक था।

अगले दिन समारोह था। पहनने के लिए एक नई, महँगी साड़ी भी भेजी गई।

माँ ने बेटे से कहा—

“बेटा, मैं अपनी पसंद की साड़ी लाई हूँ।”

“माँ, आज यह पहनना… फंक्शन में अच्छी लगेगी।”

समारोह शुरू हुआ।

माँ एक कोने में चुपचाप बैठी रहीं।

केक कटा।

तालियाँ बजीं।

माँ को किसी ने नहीं बुलाया।

फिर फोटोग्राफर ने आवाज लगाई—

“माँजी! आइए, फैमिली फोटो हो जाए।”

माँ धीरे-धीरे वहाँ पहुँचीं।

फोटोग्राफर ने अमित और उसकी पत्नी को आगे खड़ा किया, दोनों बच्चों को उनके पास खड़ा किया और माँ को सबसे किनारे खड़ा कर दिया।

“मैडम, थोड़ा मुस्कुराइए… हाँ, बस!”

क्लिक!

फोटोग्राफर बोला—

“वाह! बहुत सुंदर फैमिली फोटो है।”

माँ ने बेटे की ओर देखा—

“बेटा, अब मैं बहू व बच्चों से मिल लूँ?”

अमित ने इधर-उधर देखते हुए कहा—

“माँ, अभी मेहमान बहुत हैं। आप होटल चली जाइए। आपकी वापसी की टिकट भी हो गई है।”

माँ ने कुछ नहीं कहा।

सिर्फ मुस्कुराईं—

“ठीक है बेटा… खुश रहना।”

वही आदमी उन्हें होटल से लेकर गाँव वापस छोड़ आया।

गाँव पहुँचकर माँ अपने पुराने घर में अकेली बैठ गईं।

कुछ दिन बाद अमित ने फोन किया।

“माँ, मैंने उस दिन की फैमिली फोटो बड़ी करवाकर घर की दीवार पर लगवा दी है।”

माँ ने पूछा—

“नीचे क्या लिखा है बेटा?”

“My Best Group Family.”

कुछ क्षण खामोशी रही।

फिर माँ ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“बेटा… एक बात समझ नहीं आई।”

“क्या माँ?”

“जिस माँ को तुमने फोटो में परिवार का हिस्सा दिखाया, उसे अपने घर में परिवार का हिस्सा क्यों नहीं बनाया?”

उधर फोन पर सन्नाटा था।

माँ ने फिर कहा—

“बेटा, परिवार वह नहीं होता जो दीवार पर तस्वीर बनकर टंग जाए…

परिवार वह होता है जिसे बुढ़ापे में अपने पास बैठाने के लिए कोई बहाना न बनाना पड़े।”

फोन कट गया।

अमित देर तक उसी तस्वीर के सामने खड़ा रहा।

तस्वीर में उसकी पत्नी थी, बच्चे थे… और सबसे किनारे उसकी माँ।

सब मुस्कुरा रहे थे।

लेकिन पहली बार उसे लगा—

तस्वीर में माँ सबसे किनारे नहीं थी…

उसने तो अपनी माँ को अपनी जिंदगी में ही सबसे किनारे कर दिया था।

और तस्वीर के नीचे लिखा—

“My Best Group Family”

उसे यह वाक्य अब दुनिया का सबसे झूठा लग रहा था।



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