*एक सच लिवइन का*
उमेश कुमार सक्सेना
भोपाल के एक कॉलेज में पढ़ते-पढ़ते रोहन और सिया अच्छे दोस्त बन गए थे। पढ़ाई पूरी हुई तो दोनों को मुंबई की अलग-अलग कंपनियों में नौकरी मिल गई।
एक रविवार, पुराने दिनों की यादें ताजा करने के लिए दोनों एक कॉफी शॉप में मिले। बात कॉलेज से शुरू हुई और भविष्य तक जा पहुँची।
कॉफी का कप रखते हुए रोहन बोला, “सिया, शादी, जिम्मेदारियाँ, रिश्तेदारों के सवाल और रोज-रोज की जवाबदेही! आखिर इतनी जल्दी क्यों? हम लिव-इन में क्यों नहीं रहते? एक-दूसरे को समझ भी लेंगे और बिना किसी बन्दिश के फुल मस्ती व आजादी भी बनी रहेगी।”
सिया मुस्कराई, “बात तो सही है! खर्च आधा-आधा, आजादी पूरी-पूरी और शादी से पहले एक-दूसरे को समझने का मौका भी!”
दोनों हँस पड़े। उन्हें लगा, उन्होंने जिंदगी को जीने का एक नया और आसान रास्ता खोज लिया है।
अगले महीने वे एक फ्लैट में साथ रहने लगे। शुरुआत शानदार थी। किराया बँट गया, अकेलापन मिट गया, प्यार को भरपूर नजदीकियाँ मिलीं और जिंदगी को नए रंग मिल गये। दोनों को लगा कि उन्होंने बिना किसी बंधन के खुश रहने का नुस्खा खोज लिया है।
लेकिन वक्त हमेशा एक-सा कहाँ रहता है!
सिया का प्रमोशन हो गया, जबकि रोहन की नौकरी चली गई। सिया उसका हौसला बढ़ाती, मगर रोहन को उसकी सफलता अपनी हार लगने लगी। छोटी-छोटी बातें झगड़ों में बदलने लगीं।
एक दिन सिया तेज बुखार में तप रही थी। उसने रोहन से कहा, “आज डॉक्टर के पास मेरे साथ चलोगे?”
रोहन लैपटॉप पर नजरें गड़ाए बोला, कल “मेरा इंटरव्यू है। तुम कैब से चली जाओ।”
सिया चुप हो गई। जिस व्यक्ति के साथ उसने जीवन की खुशियाँ बाँटने तथा जीने मरने का सपना देखा था, आज उसी के पास उसके लिए कुछ पल भी नहीं थे।
सिया ने भर्राई आवाज में पूछा, “बस, इतने दिनों का साथ खत्म?”
रोहन बोला, “सिया, हमने जिंदगी भर साथ रहने का वादा थोड़े ही किया था ।
रोहन ने अपना सामान बा॑ध लिया।
सिया की आँखें नम हो गईं। वह बोली
“सही कहा तुमने! हमने आजादी तो चुनी, लेकिन यह तय करना भूल गए कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे की जिम्मेदारी कैसे निभाएँगे। हम एक छत के नीचे तो रहे, मगर शायद एक-दूसरे के दिल में घर बना ही नहीं पाए।”
रोहन ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और रोहन चला गया।
खाली कमरे में बैठी सिया सोचती रही—साथ रहने से खर्च बँट सकता है, अकेलापन कम हो सकता है और एक-दूसरे को समझने का मौका मिल सकता है। लेकिन भरोसा, संवेदना और जिम्मेदारी के बिना यही साथ एक दिन सबसे गहरा अकेलापन भी दे सकता है।
समाज के लिए संदेश*
लिव-इन में रहना गलत है या सही, यह तय करने से पहले यह समझना जरूरी है कि आजादी का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं है।
शादी हो या लिव-इन, रिश्ते की मजबूती उसके नाम से नहीं, बल्कि आपसी सहमति, सम्मान, ईमानदारी और कठिन समय में साथ निभाने की भावना से तय होती है।
याद रखिए—एक छत के नीचे रहना आसान है, किसी के दिल में जगह बनाकर उसे निभाना मुश्किल।
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