देर से समझी जिंदगी*
उमेश कुमार सक्सेना
रोहित सक्सेना सरकारी विभाग में एक अच्छे पद पर थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर उनकी एक बड़ी कमजोरी थी—शराब, जुआ और दूसरी बुरी आदतें। अच्छी-खासी आमदनी के बावजूद उन पर हमेशा कर्ज चढ़ा रहता।
उनकी इकलौती बेटी नंदिनी बेहद पढ़ी-लिखी थी। IIT बॉम्बे और फिर IIM अहमदाबाद से पढ़ाई करने के बाद वह एक प्रतिष्ठित कंपनी में ऊँचे पद पर काम कर रही थी।
रोहित अक्सर कहते—
“मेरी बेटी साधारण घर में नहीं जाएगी। लड़का उसकी शिक्षा और कमाई के बराबर होना चाहिए... और सबसे जरूरी बात, वह हमारी बात माने।”
नंदिनी चुप रहती।
एक दिन वैसा ही लड़का मिल गया—अभिषेक। अच्छी शिक्षा, शानदार नौकरी, सुसंस्कृत परिवार और अच्छा स्वभाव।
पहली मुलाकात में नंदिनी ने अभिषेक को पसंद कर लिया।
अभिषेक ने भी मुस्कराकर कहा—
“आप बहुत आत्मनिर्भर हैं। मुझे आपकी यही बात सबसे अच्छी लगी।”
नंदिनी ने जवाब दिया—
“और मुझे आपका यह कहना कि शादी दो बराबर लोगों का साथ है।”
शादी हो गई।
लेकिन कुछ ही महीनों में अभिषेक को महसूस होने लगा कि नंदिनी के माता-पिता चाहते हैं कि उसकी पूरी कमाई उनके नियंत्रण में रहे।
रोहित कहते—
“बेटा, शादी के बाद पैसा घर का होता है। अपनी सैलरी हमें दे दिया करो, हम बेहतर तरीके से संभालेंगे।”
अभिषेक मुस्कराकर टाल देता।
फिर बात आगे बढ़ी।
“अपने माता-पिता से थोड़ा दूर रहो। अब तुम्हारा असली परिवार हमारा परिवार है।”
अभिषेक ने पहली बार गंभीर होकर कहा—
“अंकल, शादी के बाद पत्नी मेरा परिवार बनी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे माँ-बाप मेरे परिवार से बाहर हो गए।”
तनाव बढ़ने लगा।
एक दिन रोहित, नंदिनी, उसका भाई, मामा और कुछ रिश्तेदार एक कमरे में बैठे।
मामा ने कहा—
“अगर यह लड़का हमारी बात नहीं मानता तो इसे दहेज के केस का डर दिखाओ। दो-चार दिन में सीधा हो जाएगा।”
अभिषेक संयोग से उस बातचीत का हिस्सा रिकॉर्ड कर चुका था।
उसने रिकॉर्डिंग किसी को दिखाई नहीं।
उसने न झगड़ा किया, न धमकी दी।
बस मन ही मन कहा—
“सच को शोर की जरूरत नहीं होती। सही समय पर वही सबसे बड़ी आवाज बनता है।”
इसके बाद वह बाहर से पहले जैसा ही व्यवहार करता रहा। लेकिन भीतर से उसने अपने जीवन की रक्षा के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए।
आखिरकार बात इतनी बिगड़ी कि नंदिनी के परिवार की ओर से तलाक की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
अभिषेक ने बहुत कोशिश की।
एक दिन उसने नंदिनी से अकेले में पूछा—
“नंदिनी, क्या तुम सचमुच यह रिश्ता खत्म करना चाहती हो?”
नंदिनी ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं... अपने माता-पिता के खिलाफ नहीं जा सकती।”
अभिषेक ने उसकी आँखों में देखा।
“लेकिन यह फैसला तुम्हारी जिंदगी का है।”
नंदिनी चुप रही।
कुछ समय बाद दोनों का तलाक हो गया।
अभिषेक ने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय लिया। कुछ वर्षों बाद उसने दूसरी शादी की। उसकी पत्नी सरल, समझदार और परिवार को जोड़कर रखने वाली थी। धीरे-धीरे उसका घर खुशियों से भर गया। बच्चे हुए और जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता गया।
उधर नंदिनी ने भी अपना करियर जारी रखा, लेकिन उम्र के साथ उसके आसपास की दुनिया बदलती गई।
माता-पिता नहीं रहे।
भाई से भी उसके संबंध अच्छे नहीं रहे।
जिस घर को वह हमेशा अपना सहारा समझती थी, वह धीरे-धीरे खाली होता गया।
कभी उसे अपनी नौकरी, अपनी सुंदरता और अपनी स्वतंत्रता पर बहुत गर्व था।
उसे लगता था—
“जिंदगी अभी बहुत लंबी है... समय मेरे हाथ में है।”
लेकिन समय किसी के हाथ में नहीं रहता।
पंद्रह-सोलह साल गुजर गए।
एक शाम नंदिनी पार्क में टहल रही थी।
अचानक उसकी नजर एक परिवार पर पड़ी।
एक आदमी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हँसते हुए चल रहा था।
नंदिनी कुछ क्षण वहीं खड़ी रह गई।
वह आदमी अभिषेक था।
दोनों की नजरें मिलीं।
समय जैसे कुछ पल के लिए रुक गया।
अभिषेक ने उसे पहचान लिया।
“नंदिनी?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“हाँ... आप कैसे हैं?”
“मैं ठीक हूँ।”
कुछ पल की खामोशी।
नंदिनी ने पूछा—
“आपने... दूसरी शादी कर ली?”
अभिषेक मुस्कराया।
“हाँ। ये मेरी पत्नी हैं... और ये मेरे बच्चे।”
नंदिनी ने बच्चों की ओर देखा।
बच्चे हँसते हुए अपने पिता का हाथ खींच रहे थे।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा—
“आप खुश हैं?”
अभिषेक ने बिना किसी गर्व के कहा—
“हाँ। बहुत।”
नंदिनी ने नजरें झुका लीं।
“मैंने आपकी बात तब नहीं समझी थी।”
अभिषेक चुप रहा।
नंदिनी की आवाज भर्रा गई—
“मैं अपने माता-पिता की बात मानती रही। मुझे लगा था कि वे मेरे लिए सबसे अच्छा ही सोच रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे मैंने अपनी जिंदगी का फैसला खुद लेना ही छोड़ दिया।”
अभिषेक ने शांत स्वर में पूछा—
“अब कैसी हो?”
वह कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
“मेरे पास नौकरी है, पैसा है, पहचान है... लेकिन घर लौटती हूँ तो कोई इंतजार नहीं करता।”
अभिषेक के चेहरे पर क्षण भर के लिए उदासी आई।
उसने कहा—
“नंदिनी, जिंदगी में सबसे महंगी गलती वह होती है जिसका एहसास बहुत देर से होता है।”
नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।
“क्या अगर मैं उस दिन तुम्हारा साथ देती... तो सब अलग होता?”
अभिषेक ने सामने खेलते बच्चों को देखा और फिर धीरे से कहा—
“शायद। लेकिन अब उस सवाल का कोई फायदा नहीं। जिंदगी पीछे मुड़कर नहीं चलती।”
नंदिनी ने पूछा—
“तुमने मुझे माफ कर दिया?”
अभिषेक मुस्कराया।
“माफ करने के लिए दिल में नफरत बची होनी चाहिए। मैंने तो बहुत पहले सब छोड़ दिया था।”
इतना कहकर उसने अपनी पत्नी की ओर देखा।
पत्नी ने दूर से मुस्कराकर हाथ हिलाया।
अभिषेक ने कहा—
“मुझे चलना चाहिए। बच्चे इंतजार कर रहे हैं।”
नंदिनी ने पहली बार उस शाम सचमुच मुस्कुराने की कोशिश की।
“हाँ... जाओ।”
अभिषेक परिवार के साथ आगे बढ़ गया।
नंदिनी वहीं बेंच पर बैठी रही।
उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे, लेकिन इस बार वे केवल पछतावे के आँसू नहीं थे।
वे एक समझ के आँसू थे—
शिक्षा ने उसे ऊँचा पद दिया था, लेकिन अपने जीवन का सही निर्णय लेने की बुद्धि उसे बहुत देर से मिली।
उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा—
“काश, मैंने तब यह समझा होता कि माता-पिता का सम्मान करना और अपनी जिंदगी का निर्णय उनके हाथों में सौंप देना—दो अलग बातें हैं।”
संदेश
बेटियों को ऊँची शिक्षा देने के साथ यह भी सिखाएँ कि अपनी जिंदगी के फैसले समझदारी से स्वयं लेना है।
माता-पिता का सम्मान करें, लेकिन अपने भविष्य की कीमत पर अपनी इच्छाओं और विवेक को न छोड़ें।
जीवनसाथी चुनते समय पैसा, पद और दिखावे से अधिक चरित्र, संस्कार, जिम्मेदारी और सम्मान देखें।
क्योंकि गलत फैसला जिंदगी को अकेला कर सकता है, लेकिन सही फैसला पूरी जिंदगी को खुशियों से भर सकता है।
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