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*अनकहा प्रेम*

 

*अनकहा प्रेम*

उमेश कुमार सक्सेना


लालचंद जी शहर के जाने-माने सेठ और दयालु व्यक्ति थे। वे ब्याज पर पैसे देकर अपना जीवन चलाते थे, लेकिन गरीबों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटते थे। उनका इकलौता बेटा राकेश गलत संगत में पड़ गया था। नशा, जुआ और आवारागर्दी उसकी जिंदगी बन चुके थे।

एक दिन आधी रात को राकेश नशे में धुत होकर घर लौटा। लालचंद जी दरवाजे पर बैठे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने दु:खी होकर कहा, “बेटा, जिस उम्र में तुम्हें मेरा सहारा बनना चाहिए, उसी उम्र में तुम मेरी सबसे बड़ी चिंता बन गए हो।”

राकेश ने झुँझलाकर जवाब दिया, “आप हर समय मुझे टोकते रहते हैं! मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने दीजिए।”

अगले दिन उसने जुए में बड़ी रकम हार दी। पैसे चुकाने के लिए वह घर के कुछ कीमती सामान तक बेचने लगा। जब लालचंद जी को इसका पता चला, तो उनका धैर्य जवाब दे गया। भारी मन से उन्होंने कहा, “आज से तुम्हारा रास्ता अलग और मेरा अलग। शायद जिंदगी का अनुभव ही तुम्हें वह सिखा सके, जो मेरी बातें नहीं सिखा सकीं।”

राकेश गुस्से में घर से निकल गया। उसे विश्वास था कि उसके दोस्त उसे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। लेकिन जेब के पैसे खत्म होते ही दोस्तों ने भी मुँह फेर लिया। जिन महफिलों में कभी उसका स्वागत होता था, उन्हीं दरवाजों पर अब उसके लिए जगह नहीं थी।

भूख ने उसे मजदूरी करने और रिक्शा चलाने पर मजबूर कर दिया। शरीर ने साथ नहीं दिया तो उसने एक खाने के ठेले पर बर्तन धोने का काम पकड़ लिया। वहीं उसने खाना बनाना सीखा। धीरे-धीरे मेहनत और लगन से उसने एक छोटी दुकान खोली, जो आगे चलकर एक अच्छे होटल में बदल गई।

उसके होटल का खाना इतना मशहूर हुआ कि ग्राहकों की भीड़ लगने लगी। पास के अनाथालय में रहने वाले डेढ़ सौ बच्चों के भोजन की आपूर्ति का काम भी उसे मिल गया।

एक दिन राकेश ने अनाथालय के प्रबंधक से कहा, “मैं अपनी जिंदगी में बहुत गलतियाँ कर चुका हूँ। अब चाहता हूँ कि इन बच्चों के चेहरे पर थोड़ी खुशी ला सकूँ। कृपया एक दिन मुझे सभी बच्चों को मुफ्त भोजन कराने की अनुमति दीजिए।”

प्रबन्धक ने मुस्कराकर कहा, “यह तो बहुत अच्छा विचार है। लेकिन भोजन की व्यवस्था में हमारी मदद करने वाले एक सज्जन से भी तुम्हें मिलना चाहिए। वे वर्षों से इन बच्चों की सहायता करते आ रहे हैं।”

“कौन हैं वे सज्जन?” राकेश ने पूछा।

प्रबंधक ने जवाब दिया, “लालचंद जी।”

यह नाम सुनते ही राकेश के हाथ से चाय का कप छूटकर जमीन पर गिर गया। वह कुछ देर तक निःशब्द खड़ा रहा। जिस पिता को वह अपना विरोधी समझता था, वही अनजान बनकर उसकी जिंदगी सँवारने में लगे थे।

प्रबंधक ने आगे बताया, “उन्होंने तुम्हारे बारे में हमें कभी कुछ नहीं बताया। बस इतना कहा था कि लड़का मेहनती है, उसे आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि तुम्हें लगे कि तुम्हारी सफलता के पीछे उनका हाथ है।”

राकेश की आँखों से आँसू बह निकले। उसे याद आया कि होटल शुरू करने के दिनों में कई बार अनजान लोगों से उसे सामान उधार मिल गया था और एक बड़े ग्राहक ने अचानक उसके होटल को काम भी दिया था। आज उसे उन घटनाओं के पीछे पिता का निःस्वार्थ स्नेह दिखाई दे रहा था।


उसी शाम वह पिता के घर पहुँचा। लालचंद जी आँगन में बैठे थे। राकेश उनके चरणों में गिर पड़ा।

“पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं समझता था कि आपने मुझे घर से निकालकर मुझसे रिश्ता तोड़ लिया। लेकिन आपने तो दूर रहकर भी मेरा हाथ थामे रखा।”

लालचंद जी ने बेटे को उठाकर गले लगा लिया। उनकी आँखें नम थीं।


“बेटा, मैंने तुम्हें घर से निकाला था, अपने दिल से नहीं। मैं चाहता था कि तुम अपनी गलतियों को समझो और अपने पैरों पर खड़े होना सीखो। तुम्हारी हर हार पर मेरा दिल रोया है, लेकिन तुम्हारी हर छोटी जीत पर मुझे गर्व हुआ है।”

राकेश ने पिता से वादा किया कि वह अब कभी गलत रास्ते पर नहीं लौटेगा। उसने अपने होटल की कमाई का एक हिस्सा अनाथ बच्चों की शिक्षा और भोजन के लिए समर्पित कर दिया।

कुछ दिनों बाद अनाथालय में भोजन का आयोजन हुआ। बच्चे खुशी-खुशी खाना खा रहे थे। एक छोटे बच्चे ने लालचंद जी से पूछा, “बाबा, आप हमारे लिए इतना सब क्यों करते हैं?”

लालचंद जी ने राकेश की ओर देखा और मुस्कराकर बोले, “बेटा, इंसान की असली कमाई वह नहीं जो उसकी तिजोरी में जमा होती है, बल्कि वह है जो किसी की जिंदगी सँवारने में काम आती है।”

राकेश ने पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया। आज उसे समझ आया कि पिता की डाँट में भी प्रेम छिपा हो सकता है और उनकी चुप्पी में भी आशीर्वाद।

उस दिन राकेश ने केवल अपने पिता को नहीं पाया, बल्कि अपने भीतर खो चुके इंसान को भी वापस पा लिया

 


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