*अ॑धेरे से उजाले तक*
By उमेश कुमार सक्सेना बडोदरा
अभय पढ़ने में बेहद तेज और स्वभाव से सीधा-सादा लड़का था। प्रतियोगी परीक्षाओं में उसके हमेशा अच्छे अंक आते, लेकिन किसी न किसी कारण से उसका चयन नहीं हो पाता। परीक्षा की तैयारी हेतु जिस पुस्तकालय में वह शाम को जाता था, उसी पुस्तकालय में नैना भी तैयारी करती थी। अभय के परिश्रम एव स्वभाव से वह बहुत प्रभावित थी और वह मन ही मन अभय को चाहने लगी थी।
एक दिन नैना ने पूछा,
“इतनी बार असफल होने के बाद भी तुम निराश नहीं होते?”
अभय मुस्कुराया,
“मैं परीक्षा में असफल हुआ हूँ, जिंदगी में नहीं।”
समय बीतता गया। अचानक एक गंभीर बीमारी के कारण अभय की आँखों की रोशनी चली गई और वह पूरी तरह दृष्टिहीन हो गया। इसके बावजूद उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी। आखिरकार उसे सफलता मिली और उसका बैंक में चयन हो गया।
नैना ने भी अपनी पढ़ाई जारी रखी। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते-करते उसने पी.एच.डी. पूरी की और एक कॉलेज में अच्छे पद पर नियुक्त हो गई।
दोनों एक-दूसरे को पहले से ही चाहते थे, लेकिन उस समय परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि पहले अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी था। किन्तु अब जब दोनों के जीवन में स्थिरता आई तो विवाह की बात चली।
परिवार ने नैना को समझाया,
“बेटी, जिंदगी बहुत लंबी है, केवल भावनाओं के सहारे नहीं कटती।”
नैना ने दृढ़ता से कहा,
“मैंने उसकी आँखों से प्यार नहीं किया था, उसके व्यक्तित्व से किया था।”
आखिर दोनों ने परिवार की सहमति से विवाह कर लिया। विवाह के समय अभय ने नैना का हाथ थामकर कहा,
“नैना, मेरी जिंदगी में अंधेरा जरूर है, मगर मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारी जिंदगी में कभी अंधेरा नहीं होने दूँगा।”
नैना की आँखें भर आईं।
लेकिन विवाह के बाद जिंदगी ने प्रेम की परीक्षा लेनी शुरू कर दी।
समारोहों में लोग अभय को देखकर फुसफुसाते। कभी कोई नैना से सहानुभूति जताता, तो कभी कोई कह देता—
“तुम इतनी पढ़ी-लिखी और योग्य हो... तुम्हें तो जिंदगी में बहुत कुछ मिल सकता था।”
शुरुआत में नैना इन बातों को अनसुना कर देती। मगर धीरे-धीरे दूसरों की नजरें उसके मन में उतरने लगीं। कभी उसे अपने पति की आँखों की कमी परेशानी लगती, कभी लोगों के सामने असहजता महसूस होती।
एक रात उसने अचानक अभय से कह दिया, कि
“कभी-कभी लगता है, मैंने गलत फैसला कर लिया।”
अभय कुछ देर चुप रहा। फिर शांत स्वर में पूछा—
“नैना, तुम मुझसे परेशान हो... या मेरी आँखों से?”
नैना के पास कोई उत्तर नहीं था।
समय के साथ कुछ लोगों ने नैना को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की। उसे भी लगा—अगर मैं अभय को छोड़ दूँ तो शायद मुझे कोई और बेहतर जीवनसाथी मिल जाए।
कई बार उसने मन ही मन तय किया कि वह यह रिश्ता खत्म कर देगी। लेकिन फिर डर जाती—पता नहीं अगला इंसान कैसा होगा?
एक दिन उसने हिम्मत करके अभय से कहा,
“अगर मैं तुम्हें छोड़ना चाहूँ तो?”
अभय ने बिना किसी शिकायत के कहा,
“जिसे रोककर रखना पड़े, वह अपना नहीं होता।”
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
अभय ने धीरे से कहा,
“लेकिन एक बात याद रखना—अंधा मैं हूँ, नैना। अगर तुम्हें मेरे भीतर सिर्फ मेरी आँखों की कमी दिखाई देती है, तो शायद असली अंधेरा तुम्हारी सोच में है।”
नैना जैसे भीतर तक काँप गई।
उसे पुस्तकालय का वह दिन याद आया, अभय की मेहनत याद आई, उसकी सफलता की खुशी याद आई और वह वादा भी—"तुम्हारी जिंदगी में कभी अंधेरा नहीं होने दूँगा।"
वह अभय के पास बैठ गई और उसका हाथ पकड़ लिया।
“अभय... मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी आँखों को तुम्हारी पूरी पहचान समझ लिया था।”
अभय ने मुस्कुराकर पूछा,
“अब?”
नैना ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“अब समझ गई हूँ—कुछ लोग आँखों वाले होकर भी रास्ता नहीं देख पाते, और कुछ लोग आँखों के बिना भी पूरी जिंदगी का रास्ता दिखा देते हैं।”
बाहर बारिश हो रही थी। कमरे में अँधेरा था, मगर उस रात पहली बार नैना को लगा कि उनके रिश्ते में सचमुच उजाला है।
यह कहानी कौन बनेगा करोड़ पति के दि0 8 व 9-9-26 को हाॅटशीट पर आये एक दृष्टिहीन प्रतियोगी के परिप्रेक्ष्य में लिखी गई है।
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