हम गए मिलने मगर, उनने धरातल छोड़ रक्खा था।
बंद दिल के द्वार-खिड़की, तम उन्होंने ओढ़ रक्खा था।।
प्रीत की संभावनाएँ खोजना था व्यर्थ ही यारा।
सिर्फ़ अपने ही अहं से, उनने नाता जोड़ रक्खा था।।
चुभ गया होगा उन्हें, शायद मिरा सच बोल देना यूँ।
बस इसी कारण उन्होंने, रूठ कर मुँह मोड़ रक्खा था।।
जो भला सा चेहरा था, था फ़क़त इक आवरण उनका।
थी हक़ीक़त ये कि सर, इंसानियत का फोड़ रक्खा था।।
हम यहाँ,उस पार वे थे, बीच में इक सेतु था लेकिन।
बंद था आवागमन, यूँ सेतु उनने तोड़ रक्खा था।।
स्वाद मीठा था कि कड़वा, बात तो लेकिन न झूठी थी।
सामने रक्खा था जो वह, 'सिद्ध' ने निचोड़ रक्खा था।।
ठाकुर दास 'सिद्ध'
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