(ग़ज़ल) ठाकुर दास 'सिद्ध',
चेहरे लटके हुए, लाचारियों सा दृश्य है।
गंध है बारूद की, चिंगारियों सा दृश्य है।।
हाथ में पत्थर लिए हैं, पत्थरों से आदमी।
फिर किसी उत्पात की, तैयारियों सा दृश्य है।।
है सदी का अंत या, इंसानियत का अंत ये।
हर तरफ़ शैतान की, किलकारियों सा दृश्य है।।
वे अमन की बात करने, बीच अपने आ गए।
हाथ में हथियार हैं, रणधारियों सा दृश्य है।।
दुश्मनों की भीड़ है, अनुकूलता की ताक में।
वक़्त है प्रतिकूल तो, आभारियों सा दृश्य है।।
स्वार्थों में लिप्त है, इन्सान ऐसा आज का।
'सिद्ध' घर-घर मुल्क से, गद्दारियों सा दृश्य है।।
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