(ग़ज़ल) ठाकुर दास 'सिद्ध',
कैसा सितम, कैसी दगाबाज़ी रही।
उसके लिए, सारी हवा ताजी रही।।
रूठी रही, ता-उम्र यारा ज़िन्दगी।
इक मौत थी, हर वक़्त जो राजी रही।।
हर बात कानों को तरसती सार की।
याँ फूलती-फलती है लफ्फाजी रही।।
है छल-कपट से प्रीत खल को बेहिसाब।
उसको सरलता से है नाराजी रही।।
सुन 'सिद्ध' तू बच ले, बचा ले,जो बचे।
हर सू नज़र शैतान की पाजी रही।।
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