(ग़ज़ल) ठाकुर दास 'सिद्ध'
ज़ख़्म फिर हरे हुए।
लोग हैं डरे हुए।।
खेत-खेत खल फिरा।
खेत सब चरे हुए।।
देख यार को लिया।
दुश्मनी करे हुए।।
प्रीत-गीत ढह गए।
चूर अंतरे हुए।।
डाल आवरण दिए।
खोट यूँ खरे हुए।।
रिक्त आम आदमी।
ख़ास हैं भरे हुए।।
उसके जो सहे सितम।
जान कटघरे हुए।।
'सिद्ध' जो भी मौन हैं।
मान लो मरे हुए।।
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