(ग़ज़ल) ठाकुर दास 'सिद्ध'
ख़ुद वफ़ा जाने न दूजे की वफ़ा समझे।
दर्दे-दिल की हम उसे क्यों कर दवा समझे।।
वाह कहता है तड़पना देख कर मेरा।
ये सितम है या तड़पने को अदा समझे।।
चल रहा है फ़ासले से तो लगे है यूँ।
वो अभी ख़ुद को ज़माने से जुदा समझे।।
बात अपनी से मुकर जाता हमेशा वो।
बात उसकी कोई कब तक तयशुदा समझे।।
देख भी लेता नज़र वो फेर भी लेता।
'सिद्ध' उसकी इस अदा को कौन क्या समझे।।
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