खामियाँ भी, खूबियाँ भी हैं, अजी इन्सान हैं।
जो न मानें बात इतनी, शख़्स वो नादान हैं।।
रूप ऐसा था, अदा ऐसी, कि दिल आ ही गया।
बात अचरज की नहीं, वो किसलिए हैरान हैं।।
जी उठूँगा मैं, अजी आ जाएँ वो जो पास में।
दिल दिया, दी जान, अब तो हम सनम बेजान हैं।।
सामने होते हैं हम, तो फेर लेते वो नज़र।
और जो ओझल हुए हम, खोजते पहचान हैं।।
है सफ़र ऐसा कि इसमें, जख़्म तो मिलने ही थे।
रास्ते हैं इश्क़ के, ये कब हुए आसान हैं।।
क्या ख़ता है 'सिद्ध' मेरी, है जो उनकी आरजू।
मुस्कुराते वो तो सौ-सौ, डोलते ईमान हैं।।
ठाकुर दास 'सिद्ध'
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