दुल्हन का डोला कहारों ने लूटा।
मेरे चमन को बहारों ने लूटा।।
किस मुँह से दुश्मन को दें गालियाँ हम।
जब मेरे घर को है यारों ने लूटा।।
तूफ़ाँ से लड़कर किनारे पे आए।
कश्ती को लेकिन किनारों ने लूटा।।
रिश्ते हमारे थे मजबूत लेकिन।
रिश्तों का रुतबा दरारों ने लूटा।।
मंज़िल के नज़दीक पहुँचे क़दम तो।
फिर काफिले को गुबारों ने लूटा।।
मेरे इरादे गगन चूमते थे।
उनको गगन के सितारों ने लूटा।।
किस-किस का लें नाम, ये 'सिद्ध' सोचे।
जब देश, चोरों, हज़ारों ने लूटा।।
ठाकुर दास 'सिद्ध',
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