बहुत किया विस्तार झूठ ने, मान कपट ने पाया देखो।
दुत्कारों की लिए पोटली, सच फिरता बौराया देखो।।
सारे सुख महलों में बंदी,केवल ख़ास-ख़ास की ख़ातिर।
आम आदमी के जीवन में, केवल दुख ही आया देखो।।
जब तक मतलब,तब तक यारी,व्यथा कथा है ये घर-घर की।
मतलब निकला तो फिर यारो,अपना हुआ पराया देखो।।
हर पल केवल छल ही छल है,जग से ज्यादा ख़ुद से यारो।
मन का मैल छुपाता जग से, धोता अपनी काया देखो।।
जिस-जिस का अंतस निर्मल है,वह उजियारे को चाहेगा।
जिसके मन में चोर विराजे, उसको ही तम भाया देखो।।
तेज़ हुई नफ़रत की धारा,लाखों लोग लगे हैं बहने।
धारा के विपरीत 'सिद्ध' ने, प्रीत गीत तब गाया देखो।।
ठाकुर दास 'सिद्ध',
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