मुझे असफलताओं ने मारा है
वक़्त ने बहुत लताड़ा है
सहा है हर एक जख्म मगर
ये दिल ना अब तक हारा है
गिरा हज़ारों बार हूँ पर
मुझे उठकर चलना आता है
मैं एक दिन मंजिल को पा लूँगा
मुझको लड़ना आता है
है सिर में मेरे सनक बसी
एक पागलपन है सीने में
जो लड़ा नहीँ वो क्या जाने
क्या मजा है लड़ के जीने में
मुझे तूफ़ानी लहरों में भी
पतवार चलाना आता है
मैं एक दिन मंजिल को पा लूंगा
मुझको लड़ना आता है
©सूरज कुमार मिश्र
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