मुझे ही मेरी ग़ज़ल जब सुनाया नक्कालों नें !
दिल को घेर लिया मेरी क़लम के सवालों नें !!
मेरे नाम का अब तक कोइ मोल नहीं शायद!
तभी उसके नाम को मँहगा ख़रीदा बाज़ारवालों नें !!
मैने जिसकी इक नज़र पर हरेक शे'र कर डाला !
मतला क्या मख़ता क्या पहचाना भी ना हुश्नवालों ने !!
ग़ज़ल को गाने का सलीका कोई फनकार जाने है !
एक नेता पर नज़र कर दी उन अदना कव्वालों ने !!
मुझको शर्म आती है अब कहाँ पहुँची है ओ जाकर !
"साँझ" बड़े ही ऊँचे सुर में गाया उन कोठेवालों ने !!
सुनील मिश्रा "साँझ"
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