सुशील शर्मा
सदी सी लंबी
यादों की ये बारात
गहरी चोटें
भूलना है मुश्किल
सहना ही सहना।
मन का धन
स्वस्थ रहे शरीर
मन प्रसन्न
परिवार हो सुखी
रिश्ते हों बहुमुखी।
सकपकाई
चर्चित सी चांदनी
छत पे आई
रातरानी की खुश्बू
महकता आँचल।
गुनगुनाती
अलसाई सुबह
गाल थपाती
कोहरे की रजाई
ओढ़े धूप मुस्काई।
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