गगनांगना छंद
25 मात्राएँ
16 ,9 पर यति चरणान्त में गुरु लघु गुरु क्रमागत दो चरण तुकांत
राम लखन की शोभा न्यारी ,हर्षित घूमते।
ऊँचे ऊँचे भवन सजे हैं ,बादल चूमते।
रूप किशोरी जनक दुलारी ,अति प्रिय जानकी।
नैना निहारते सुन्दर छवि ,कृपा निधान की।
डिगा नहीं धनुष किसी से भी ,जनक निराश थे।
मस्तक सब का झुका हुआ था ,हृदय हताश थे।
वीर हीन वसुंधरा लगती ,राजा ने कहा।
ये पिता का अति दारुण कष्ट ,सीता ने सहा।
वीरों से पृथ्वी हीन नहीं ,भृकुटि तेज तनी।
रघुवंशी अबतक जीवित हैं ,वीरों के धनी।
रघुवर का सिय पर दृष्टिपात,प्रभु की वंदनी
धनुष भंग की अनुमति मांगी,हर्षित नंदनी।
एक पल में शिव धनुष उठा है ,प्रत्यंचा चढ़ी।
मन में हर्षित जनकदुलारी ,प्रभु प्रभुता मढ़ी।
*मगसम-2613/2015*
सुशील कुमार शर्मा
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