सुशील शर्मा
माटी के बोल
तू क्या रौंदेगा मोहे
रौंदोगी तोहे।
मिट्टी में बीज
अंकुरित जीवन
खुला आकाश
माटी का तन
माटी में मिल जावे
आत्मा अमर
देश की माटी
पवित्र और पूज्य
मन को भाती।
माटी के रंग
फूलों में है खिलते
प्रकृति संग।
माटी के साथ
खेलता बचपन
निर्मल मन।
युवा है तन
माटी उगले सोना
श्रम के मोती।
अंतिम यात्रा
माटी बना खिलौना
माटी समाया।
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