Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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"सुकून भरी जिंदगी - सरयू तट से"

 
"सुकून भरी जिंदगी - सरयू तट से"

उठ रामभक्त हनुमत सा बन, कायरता की लंका जला दे , 
सरयू की लहरों सा निर्मल, हर साँस में संकल्प जगा दे  !
टूटे युगों की ईंटों से, नव अयोध्या फिर गढ़ ले तू , 
गिर-गिर कर उठना सीख ले, धरती खुद तेरे पग चढ़ ले तू ।

भीतर का दीपक बुझने ना दे, रावण-सी रात घिरे आए,  
वनवास हो या तीर-कमान, मर्यादा का माथा झुके ना पाए। 
कर्म-धर्म की को दंड उठा, सत्य राह पर जयघोष बोल,  
छल-कपट की दीवारें ढहा, निर्भय होकर राम काज डोल। 

सरयू तट की रेत बन जा, प्यासे जग की प्यास बुझा दे,  
जन्मभूमि की धूल बन जा, कण-कण में तिलक सजा दे। 
देश-धर्म की चिंता ले, हर धड़कन में राष्ट्र बसा ले,  
स्वार्थ-माया से ऊपर उठ, जन-सेवा का व्रत रचा ले।  

मृत्यु का भय क्या डराएगा, जब जीवन राम-काज बन जाए, 
"भीतर का तूफान" जगा ले, काल भी तेरे आगे झुक जाए।  
सुकून नहीं है राजमहल में, सुकून है सरयू की धूल में,  
जो राम के लिए जिए-लड़े, असली सुख बस उसी की झोली में ।

इसमें अयोध्या, सरयू, रामकाज, मर्यादा सब आ गया। 
- सुख मंगल सिंह,वाराणसी 




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