"सुकून भरी जिंदगी - सरयू तट से"
उठ रामभक्त हनुमत सा बन, कायरता की लंका जला दे ,
सरयू की लहरों सा निर्मल, हर साँस में संकल्प जगा दे !
टूटे युगों की ईंटों से, नव अयोध्या फिर गढ़ ले तू ,
गिर-गिर कर उठना सीख ले, धरती खुद तेरे पग चढ़ ले तू ।
भीतर का दीपक बुझने ना दे, रावण-सी रात घिरे आए,
वनवास हो या तीर-कमान, मर्यादा का माथा झुके ना पाए।
कर्म-धर्म की को दंड उठा, सत्य राह पर जयघोष बोल,
छल-कपट की दीवारें ढहा, निर्भय होकर राम काज डोल।
सरयू तट की रेत बन जा, प्यासे जग की प्यास बुझा दे,
जन्मभूमि की धूल बन जा, कण-कण में तिलक सजा दे।
देश-धर्म की चिंता ले, हर धड़कन में राष्ट्र बसा ले,
स्वार्थ-माया से ऊपर उठ, जन-सेवा का व्रत रचा ले।
मृत्यु का भय क्या डराएगा, जब जीवन राम-काज बन जाए,
"भीतर का तूफान" जगा ले, काल भी तेरे आगे झुक जाए।
सुकून नहीं है राजमहल में, सुकून है सरयू की धूल में,
जो राम के लिए जिए-लड़े, असली सुख बस उसी की झोली में ।
इसमें अयोध्या, सरयू, रामकाज, मर्यादा सब आ गया।
- सुख मंगल सिंह,वाराणसी
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