मनोहर की सीख : सोच जितनी, प्राप्ति उतनी
एक गाँव में मनोहर नाम का एक वृद्ध किसान रहता था। उसके दो पुत्र थे - बड़ा पुत्र अर्जुन और छोटा पुत्र करण। मनोहर ने जीवन भर मेहनत कर थोड़ी जमीन, एक घर और समाज में इज्जत बनाई।
बुढ़ापे में उसने एक दिन दोनों पुत्रों को पास बुलाया।
मनोहर ने अपने पुत्रों से कहा :-
बेटा अर्जुन, बेटा करण,
बेटे, तुम्हारी जिम्मेदारी क्या है?
बेटे बोले:-
बड़े ने कहा - पिता, मेरी जिम्मेदारी है, खेत से अनाज लाना और अपना पेट भरना।
छोटे ने कहा - पिता, मेरी जिम्मेदारी है, पैसा कमाना और शहर में अपना घर बनाना।
मनोहर मुस्कुराया और बोला:-
पिता ने कहा:-
तुम लोगों ने समाज में, परिवार का, घर की मदद नहीं की।
तुमने कभी नहीं सोचा कि इस घर की छत टपकती है तो पिता कैसे सोता है।
तुमने कभी नहीं सोचा कि समाज के किस गरीब को तुम्हारी जरूरत है।
तुमने सिर्फ अपनी थाली देखी, अपना घर देखा।
यही कारण है कि ईश्वर ने उतना ही दिया जितनी तुम्हारी सोच थी।
जिसकी सोच कुएँ जितनी, उसे कुएँ जितना ही जल मिलता है,
जिसकी सोच सागर जितनी, उसे सागर मिलता है।
उसी रात मनोहर ने कहानी के माध्यम से शास्त्रों का अर्थ समझाया -
1. वेदों के अनुसार:
वेद कहते हैं :-
"मनुर्भव"
अर्थात मनुष्य बनो।
और
"संगच्छध्वं संवदध्वं"
- साथ चलो, साथ बोलो।
ऋग्वेद कहता है जो अकेला खाता है, वह पाप खाता है :-
"केवलाघो भवति केवलादी"
अर्थ - पुत्रों, तुम अकेले की सोच रखोगे तो जीवन में पाप और दरिद्रता ही आएगी। परिवार और समाज के साथ चलोगे तो देवता भी तुम्हारी मदद करेंगे।
2. गीता के अनुसार :
भगवान कृष्ण कहते हैं -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
और -
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
अर्थ - पुत्र, कर्म यज्ञ के लिए करो। परिवार एक यज्ञ है, समाज एक यज्ञ है। तुमने यज्ञ में आहुति नहीं दी, सिर्फ प्रसाद खाना चाहा। इसलिए फल भी छोटा मिला। जो परिवार और समाज के यज्ञ में अपना स्वार्थ आहुत करता है, ईश्वर उसे सौ गुना लौटाता है।
3. रामायण के अनुसार:
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं:-
"पितु आयसु सब धर्मक काजू"
और
"सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं"
राम ने पिता के वचन के लिए राज छोड़ दिया और पूरी दुनिया ने उन्हें भगवान बना दिया। भरत ने भाई के लिए राज ठुकरा दिया तो आज तक भारत उनके नाम से जाना जाता है।
तुमने पिता की बात नहीं मानी, घर की जिम्मेदारी नहीं समझी, इसलिए आज समाज में तुम्हारा नाम नहीं, सिर्फ नाम के लिए जी रहे हो।
कहानी का अंत और संदेश:
दोनों पुत्रों की आँखें खुल गईं। उन्होंने पिता के पैर पकड़ लिए।
अगले दिन से बड़ा बेटा खेत के साथ-साथ गाँव के स्कूल की मरम्मत करने लगा, छोटा बेटा अपनी कमाई से घर की छत ठीक कराने लगा और गाँव के दो गरीब बच्चों की फीस भरने लगा।
धीरे-धीरे मनोहर का घर फिर से धन-धान्य से भर गया, और समाज में उनके पुत्रों का सम्मान बढ़ गया।
दुनिया के लिए संदेश:
बच्चो, बड़े-बुजुर्गों की बातें पुरानी नहीं, अनुभवी होती हैं।
आज का युवा मोबाइल में दुनिया देखता है, पर बुजुर्गों की आँखों में पूरी दुनिया का अनुभव देखना भूल जाता है।
जिस घर में बुजुर्गों की सुनी जाती है, वहाँ वेदों की वाणी गूंजती है,
जहाँ गीता का कर्म होता है, वहाँ रामायण का राम बसता है।
सोच छोटी रखोगे तो ईश्वर छोटा देगा,
सोच में परिवार और समाज को रखोगे तो ईश्वर तुम्हें राजा बना देगा।
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